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'रिदम किंग' ओ पी नैय्यर

अहम् से भरपूर, स्वभाव से अक्खड़ वो सुरीला शख्स जिसे संगीतप्रेमी ओ पी नैय्यर कहते हैं। संगीत की दुनिया में लीक से हटकर चलने वालों में शुमार नैय्यर ने कभी भी सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर के साथ काम नहीं किया। किसी गीतकार की शक्ल पसंद न आने की वजह से वे उसके साथ बैठते नहीं थे, तो एक गीतकार ऐसा भी था, जिसे इतना अदब करते थे कि उसके सामने वो बैठना पसंद नहीं करते थे। नैय्यर इन सबके बावजूद सबके चहेते थे। दिल के साफ और काम के पक्का संगीतकार एक समय में हिन्दी जगत का सबसे महंगा संगीतकार था। आज उनके सालगिरह पर सिने चिट्ठा की खास पेशकश ...

संगीतकार ओ पी नैय्यर ने लता मंगेशकर के साथ न काम करने की कसम खाई
मुंबई। ओ पी नैय्यर यानी ओंकार प्रसाद नैय्यर। हिन्दी सिने जगत का ऐसा संगीतकार जिसे 'रिदम किंग' कहा जाता है। 16 जनवरी 1926 को लाहौर (पाकिस्तान) के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्में ओ पी का झुकाव शुरू से ही संगीत की तरफ था। वो प्लेबैक सिंगर बनना चाहते थे। छोटे से ओ पी को स्कूल में भर्ती करवाया गया, लेकिन उनका मन पढ़ाई में नहीं, संगीत में रमता था।

महज 8 वर्ष की उम्र में लाहौर रेडियो में गाने का अवसर मिला। दस साल की उम्र आते - आते तो वे संगीतकार बन गए। बतौर संगीतकार पंजाबी फिल्म "धुलिया भट्टी" में संगीत दिया। इसमें सी एच आत्मा का गाया गीत, जिसे एचएमवी ने रिलीज़ किया।

वो गाना था, "प्रीतम आन मिलो ..."। यह गाना और फिल्म सुपरहिट रही। इस फिल्म में वे संगीतकार तो थे ही, साथ में एक छोटी सी भूमिका भी निभाई। इसके बाद वो संगीत में ही रम गए। भारत विभाजन के बाद उनका पूरा परिवार लाहौर से अमृतसर चला आया।


फिल्मी सफर की शुरुआत

बतौर संगीतकार हिन्दी सिने जगत में अपनी पहचान बनाने के लिए नैय्यर साल 1949 में मुंबई आ गए। यहां आने के बाद वे निर्माता निर्देशक कृष्ण केवल से मिले। उस वक्त कृष्ण फिल्म 'कनीज़' का निर्माण कर रहे थे।

कृष्ण ने ओ पी की बनाई कुछ धुनों को सुना, और वे बेहद प्रभावित हुए। इसी वजह से फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक देने को कहा। फिल्म असफल रही, लेकिन उनका करियर तो शुरू हो गया।

इसके बाद वे फिर मुंबई से दिल्ली चले गए और वहां उनकी मुलाकात पंचोली से हुई, जो उन दिनों फिल्म 'नगीना' बना रहे थे। इस फिल्म में भी ओपी ने संगीत में योगदान तो दिया। लेकिन बतौर संगीतकार उन्होंने फिल्म 'आसमान' से अपने सिने करियर की शुरुआत की।

इस फिल्म के लिए उन्होंने सी एच आत्मा की आवाज में अपना पहला गाना रिकार्ड करवाया। गाने के बोल कुछ इस प्रकार थे 'इस बेवफा जहां में वफा ढूंढते हैं'। इस बीच उनकी 'छमा छम छम' और 'बाज' जैसी फिल्में भी प्रदर्शित हुई, लेकिन इन फिल्मों के असफल होने से उन्हें गहरा सदमा पहुंचा और उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री छोड़ वापस अमृतसर जाने का निर्णय कर लिया।

लेकिन तभी गीता दत्त ने ओ पी नैय्यर को गुरुदत्त से मिलने की सलाह दी। गुरुदत्त से मुलाकात के बाद नैय्यर ने मुंबई से जाने के फैसले को रद्द किया और वो अपने काम में जुट गए।

साल 1954 में गुरुदत्त ने अपनी निर्माण संस्था शुरू की और अपनी फिल्म 'आरपार' के संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी नैय्यर साहब को दे दी। इस फिल्म के गाने ने सफलता का परचम लहरा दिया। ओ पी नैय्यर बतौर संगीतकार अपना नाम बनाने में सफल हो गए और अमृतसर जाने का इरादा छोड़ दिया।

सफलता के बाद गुरुदत्त की अगली फिल्म 'मिस्टर एंड मिसेज 55' के लिये भी ओ पी नैय्यर ने संगीत दिया। इस फिल्म के गाने 'जाने कहां मेरा जिगर गया जी' और 'ठंडी हवा काली घटा' काफी मशहूर हुए।


महंगे संगीतकार

सफलता की सीढ़ियां चढ़ते गए नैय्यर साहब की जिन्दगी में एक ऐसा भी मुकाम आया, जहां से सबसे बड़े नज़र आए। 'आरपार', 'सीआईडी', 'तुमसा नहीं देखा' एक के बाद एक सफल फिल्मों को देने के बाद वे हिन्दी सिने जगत के सबसे महंगे संगीतकार बन गए।

उस दौर में एक फिल्म का संगीत देने के 1 लाख रुपए लेने वाले पहले संगीतकार बने। साल 1957 में इन्हें फिल्म 'नया दौर' के फिल्म फेयर अवॉर्ड से नवाज़ा गया।

'भीष्म शपथ'

सफलता के शिखर पर बैठे ओ पी नैय्यर ने कभी सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर के साथ काम नहीं किया। इसकी वजह थी उनकी 'भीष्म शपथ'। दरअसल, साल 1952 की बात है।

बतौर संगीतकार ओ पी नैय्यर की पहली फिल्म 'आसमान' थी। इसमें गीता दत्त और सी एच आत्मा ने इस फिल्म के आठ गाने गाए। लेकिन एक आखिरी गाना, जो फिल्म की सहनायिका पर फिल्माना था, वो बच गया था।

इस गाने के लिए लता मंगेशकर को बुलाया गया। जब इस गाने के बारे में लता को पता चला कि यह नायिका पर नहीं, बल्कि सहनायिका पर फिल्माया जाएगा, तो उन्होंने इस गाने में अपनी आवाज़ देने से इनकार कर दिया।

कहा जाता है कि लता उस समय की बड़ी गायिकाओं में गिनी जाने लगी थीं, तो उनके अहम को धक्का लगा। लेकिन लता के इनकार की बात जब नैय्यर साबह तक पहुंची, तो बहुत नाराज़ हुए।

इसके बाद उन्होंने लता मंगेशकर के साथ कभी न काम करने का 'भीष्म शपथ' लिया। इस शपथ को नैय्यर साहब ने बखूबी निभाया। पहली फिल्म में लिए फैसले को उन्होंने अंतिम फिल्म तक कायम रखा।

यहां तक ​​कि मध्यप्रदेश सरकार का लता मंगेशकर के नाम पर दिए जाने वाला पुरस्कार भी नैय्यर साहब ने इसलिए ठुकरा दिया था, क्योंकि वह लता के नाम पर था। यह वह दौर था, जब नैय्यर साहब आर्थिक तंगी से गुज़र रहे थे। बावजूद इसके इस पुरस्कार राशि को अपने आखिरी कष्ट भरे दिनों में लेने से मना कर दिया।

अक्खड़ स्वभाव

नैय्यर एकदम मुंहफट अक्खड़ स्वभाव के थे। तभी तो उनके बरसों पुराने दोस्त उनसे अलग हो गए। उन्होंने गीता दत्त, आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी के साथ ही ज्यादा काम किया है।

लेकिन इन तीनों से ही बारी बारी झगड़ा कर लिया। लता से न गवाने की सूरत में इन्होंने आशा को निखार दिया। यहां तक ​​कि हिन्दी सिने जगत में कहा जाता है कि आशा ओ पी नैय्यर की खोज हैं। आशा को बुलंदी तक पहुंचाने में भी इन्हीं का हाथ है।

इन दोनों के रिश्तों के बारे में भी कई बातें कहीं गई। कुछ का मानना ​​था कि संगीतकार और गायिका से बढ़कर ये दोनों प्रेमी थे। दोनों ने तकरीबन सत्तर फिल्में साथ में की हैं। खैर, कहने सुनने को तो कई बातें हैं, लेकिन दोनों ने इसका इज़हार कभी नहीं किया, सिवाय एक मौक़े के।

नैय्यर साहब ने एक दफे यह ज़रूर कहा था, 'मोहब्बत में सारा जहां लुट गया था .. "। यह साल 1961 की बात थी। इसके बाद दोनों में फिर से सुलह हो गई। लेकिन यह सुलह साल 1972 में ही टूट भी गई। दूसरी बार जब दोनों ने एक दूसरे को छोड़ा, तो फिर कभी न मिले।

नैय्यर साहब ने आशा के अलावा महेंद्र कपूर को भी खोजा। मोहम्मद रफी से झगड़ा होने के बाद ओ पी साहब महेंद्र कपूर के साथ काम करने लगे। वे सिर्फ चुलबुले और छेड़छाड़ वाली धुने ही नहीं बनाते थे, बल्कि गंभीर धुनों को भी रचते थे। उनमें से एक है मुकेश का गाया हुआ 'चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला'।


अनजान और प्रदीप के साथ न बैठना

ओ पी नैय्यर के स्वभाव से सभी वाकिफ थे। जानकर अचरज होगा कि कवि प्रदीप के साथ वे मिलने से वे मना कर देते थे। वजह थी कि नैय्यर को कवि प्रदीप की शक्ल पसंद नहीं थी। हालांकि, प्रदीप से उन्होंने अपनी एक फिल्म के गीत लिखवाए थे। वह फिल्म थी साल 1969 में आई 'संबंध'।

कवि प्रदीप एकदम सरल हृदय सज्जन व्यक्ति थे। नैय्यर के मुंहफट अक्खड़ स्वभाव को वो जानते थे। इसलिए बिना किसी गिले शिकवे के वे काम करके भिजवा दिया करते थे।

इसी तरह गीतकार अनजान से नैय्यर ने फिल्म 'बहारें फिर भी आएंगी' के गीत लिखवाए थे। अनजान से भी नैय्यर ने निवेदन किया था कि वे मिलने न आया करें। अनजान ने वजह पूछा, तो नैय्यर ने बताया, 'यार, तुम बहुत शरीफ़ आदमी हो और मैं गालियां-शालियां देकर बात करता हूं। मुझे अच्छा नहीं लगता। '


समर्पण

अपने काम के प्रति जो समर्पण नैय्यर साहब में था, विरले ही किसी और में देखने को मिलता है। 'शरारत' और 'रागिनी'- इन दोनों फिल्मों में किशोर कुमार के लिए मोहम्मद रफी ने गाया है। लेकिन शुरू में नैय्यर की इस बात से किशोर कुमार राजी नहीं थे।

साल 1958 में आई फिल्म 'रागिनी' के निर्माता अशोक कुमार थे और किशोर के साथ वह भी इस फिल्म में अभिनय कर रहे थे। इस फिल्म का गाना 'मन मोरा बावरा' शास्त्रीय-संगीत पर आधारित था। इसलिए नैय्यर ने तय किया कि ये गाना वह रफ़ी से गवाएंगे।

किशोर कुमार को मंज़ूर नहीं था कि पर्दे पर वह रुी की आवाज लें। वह बड़े भैया के पास गए। लेकिन दादामुनि ने दख़लअंदाज़ी से साफ़ इंकार कर दिया। दादामुनि के सामने किशोर चुपचाप अपना सा मुंह लेकर चले आए।


शर्मिला को टोका

नैय्यर अपने गानों को लेकर अभिनेता और अभिनेत्रियों तक को टोक दिया करते थे। एक बार की है बात, वे अपने एक गाने पर शर्मिला टैगोर को एक्ट करते हुए देख रहे थे। शर्मिला का उस गाने पर सिर्फ लिप्सिंग करना उन्हें नहीं भाया। सो आगे से बढ़कर उन्होंने सलाह दे डाली।

नैय्यर ने कहा, "मेरे गीतों में आप बस खड़े रहकर लब नहीं हिला सकते, ये गाने हरकतों के हैं, आपको अपने शरीर के हाव भावों का भी इस्तेमाल करना पड़ेगा"। शर्मिला ने उनकी इस सलाह को गांठ बांध ली और अपनी हर फिल्म में इस बात का ख़ास ध्यान रखा।


ब्रॉडकास्ट पर रोक

कितनी अजीब बात है कि आल इंडिया रेडियो ने उनके कुछ गीत ब्रॉडकास्ट करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। यह कहकर कि इनके बोल और धुन युवा पीढ़ी को भटका रहा है। लेकिन बाद में रेडियो सीलोन पर उनके गीतों को सुनने की बढ़ती मांग के चलते उनपर लगा प्रतिबंध हटाना ही पड़ा।


मधुबाला ने फीस कम की

महज 30 साल की उम्र में उन्हें "रिदम किंग 'की उपाधि मिल गई थी। उन्होंने संगीतकार के दर्जे को हमेशा ऊंचा माना और एक लाख रुपए पाने वाले पहले संगीत निर्देशक बने। शम्मी कपूर के आने के बाद तो ओ पी नैय्यर के साथ साथ हिन्दी फिल्म संगीत भी जैसे फिर से जवान हो उठा।

मधुबाला ने तो यहां तक ​​कह दिया था कि वो अपना पारिश्रमिक उन निर्माताओं के लिए कम कर देंगीं जो ओ पी को संगीतकार लेंगें। मधुबाला की 6 फिल्मों के लिए ओ पी ने संगीत दिया। वो उन दिनों के सबसे मंहगे संगीतकार होने के बावजूद उनकी मांग सबसे अधिक थी।

फिल्म के शो रील में उनका नाम अभिनेताओं के नाम से पहले आता था। ऐसा पहले किसी और संगीतकार के लिए नहीं हुआ था, ओ पी ने ट्रेंड शुरू किया जिसे बाद में बहुत से सफल संगीतकारों ने अपनाया।

28 जनवरी 2007 को भारतीय हिन्दी सिनेमा संगीतकार ओ पी नैय्यर खो दिया। ओंकार प्रसाद नैय्यर हिंदी फिल्म संगीत में ऐसे ध्रुवतारे की तरह हैं, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ेगी।

उनके कुछ प्रसिद्ध गानें

  1. आओ हुज़ूर तुमको सितारों में ले चलूं
  2. आंखों ही आंखों में इशारा हो गया
  3. चैन से हमको कभी आपने जीने न दिया
  4. चल अकेला, चल अकेला
  5. आप यूं ही अगर हमसे मिलते रहे
  6. मेरा नाम है चिन-चिन चूं
  7. बाबू जी धीरे चलना
  8. उड़े जब-जब ज़ुल्फ़ें तेरी
  9. ये लो मैं हारी पिया
  10. कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना
  11. लेके पहला पहला प्यार
  12. ये देश है वीर जवानों का