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मनोज कुमार को मिला 'दादा साहेब फ़ाल्के' अवॉर्ड

‘पूरब और पश्चिम’, ‘उपकार’ और ‘क्रांति’ जैसी देशभक्तिपूर्ण फिल्मों को बनाने वाले अभिनेता-निर्देशक मनोज कुमार को हिंदी सिने जगत में उनके योगदान के लिए 'दादा साहेब फाल्के' अवॉर्ड दिया जाएगा। 78 वर्षीय अभिनेता अवॉर्ड पाने वाले 47वें व्यक्ति हैं। भारतीय सिनेमा के इस सर्वोच्च सम्मान के अंतर्गत एक स्वर्ण कमल, 10 लाख रुपये नकद राशि और एक शॉल दिया जाता है। बतौर रोमांटिक अभिनेता अपने सिने करियर की शुरुआत करने वाले मनोज कुमार को उनके देशभक्ति से ओतप्रोत फिल्में बनाने के लिए उन्हें 'भारत कुमार' का उपनाम दिया गया। कैसे पड़ा इनका नाम 'भारत कुमार', किस भारतीय अभिनेता ने इन्हें अभिनय के क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया और पाकिस्तान के एबटाबाद से मुंबई तक आने का सफर कैसा रहा। दो बार वापसी करने के बाद फिर क्यों सिनेमा से सन्यास ले लिया। सब कुछ विस्तार से पढ़ने के लिए आगे क्लिक करें।

मनोज कुमार एक समारोह में
मुंबई। बॉलीवुड के बहुआयामी कलाकार के रूप में जाने वाले अभिनेता मनोज कुमार को फिल्म इंडस्ट्री में उनके सर्वश्रेष्ठ योगदान के लिए फिल्म जगत के सर्वोच्च सम्मान 'दादा साहेब फाल्के' अवॉर्ड देने की घोषणा की गई है।

जाहिर की खुशी 

मनोज कुमार को साल 2015 के लिए दादा साहेब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। भारत सरकार की ओर से शुक्रवार को उनके नाम की घोषणा होने के बाद उन्होंने अपनी पहली प्रतिक्रिया में खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा कि यह पुरस्कार मिलने पर मैं बेहद आनंद महसूस कर रहा हूं। मैंने दिल से देशभक्ति पर फिल्में बनाई है। इस पल मुझे अपनी फिल्म का गीत याद आ रहा है-भारत का रहने वाला हूं भारत की बात सुनता हूं।

लगा बधाईयों का तांता 

फिल्मकार मधुर भंडारकर सहित बॉलीवुड की कई हस्तियों ने मनोज को फोन करके और सोशल मीडिया पर बधाइयां दी है। उनके नाम के चयन के बाद केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अरूण जेटली ने भी उनसे बातचीत की और उन्हें बधाई दी। इस साल लता मंगेशकर, आशा भोसले, सलीम खान, नितीन मुकेश और अनूप जलोटा की पांच सदस्यीय जूरी ने फालके पुरस्कार के लिए मनोज के नाम की सिफारिश की।

एबटाबाद से मुंबई तक 

मनोज कुमार ऐसी प्रतिभा का नाम हैं, जिन्होंने फिल्म निर्माण की लगभग हर विधा में हाथ आजमाया है। वे अभिनेता भी हैं और लेखक भी, वो डायरेक्टर भी हैं, तो प्रोड्यूसर भी हैं। उनमें एडिटिंग का हुनर भी समाया हुआ है। मनोज कुमार का असली नाम हरिकिशन गिरी गोस्वामी है। इनका का जन्म 24 जुलाई 1937 में हुआ था।

जब वे दस साल के थे, तभी उनका पूरा परिवार राजस्थान के हनमुानगढ़ जिले में आकर बस गया। मनोज कुमार को बचपन से ही फिल्मों से लगाव था। एक बार उन्होंने दिलीप कुमार की फिल्म 'शबनम' देखी। इस फिल्म में दिलीप कुमार के निभाये किरदार से मनोज कुमार बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने अभिनेता बनने का फैसला ले लिया। 

मनोज कुमार ने ग्रेजुएशन दिल्ली के हिंदू कॉलेज से किया। इसके बाद वो अपने अभिनेता बनने के सपने को लेकर मुंबई आ गए। बतौर अभिनेता मनोज कुमार ने अपने सिने करियर की शुरुआत साल 1957 में प्रदर्शित फिल्म 'फैशन' से की। हालांकि, कमजोर पटकथा और निर्देशन के कारण फिल्म टिकट खिड़की पर बुरी तरह से पिट गई।

सफलता का संघर्ष 

करियर की शुरुआत में मनोज कुमार का मुका़बला नाकामयाबी के थपेड़ों से हुए। साल 1957 से 1962 तक मनोज कुमार अपनी जगह बनाने के लिए कड़ा संघर्ष किया। फिल्म 'फैशन' के फ्लॉप होने के बाद, उन्हें मुंबई में अपने आप और अपने सपने को जिंदा रखने के लिए, जो भी फिल्में मिलती थीं, वो उसे स्वीकर कर लेते थे। इस दौराना उन्होंने 'कांच की गुड़िया', 'रेशमी रूमाल', 'सहारा', 'पंयायत', 'सुहाग सिंदूर', 'हनीमून', 'पिया मिलन की आस' जैसी कई बी ग्रेड फिल्मों में अभिनय किया। यह सभी फिल्में टिकट खिड़की पर बेदम ही रहीं। 

 सुपरहिट फिल्म 'पूरब और पश्चिम' में मनोज कुमार

मनोज कुमार के करियर को सितारा निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट की साल 1962 में आई फिल्म 'हरियाली और रास्ता' से चमका। इस फिल्म में मनोज कुमार के अपोजिट माला सिन्हा थीं। मनोज कुमार और माला सिन्हा की जोड़ी को दर्शकों ने बेहद पसंद किया।

इसके बाद साल 1964 में आई फिल्म 'वौ कौन थी' भी सुपरहिट हुई। फिल्म में उनकी नायिका की भूमिका साधना ने निभाई थी। रहस्य और रोमांच से भरपूर इस फिल्म में साधना की रहस्यमय मुस्कान के दर्शक दीवाने हो गए थे। साल 1965 में ही मनोज कुमार की एक और सुपरहिट फिल्म 'गुमनाम' आई। इसमें रहस्य और रोमांस के ताने-बाने से बुने मधुर गीत-संगीत और बैकग्राउंड म्युजिक का का जबरदस्त इस्तेमाल किया गया था। इसी साल मनोज कुमार को विजय भटृ की फिल्म 'हिमालय की गोद' में काम करने का अवसर मिला। यह फिल्म टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुई। इस फिल्म में भी मनोज कुमार की नायिका माला सिन्हा थी। 

यह साल मनोज कुमार के नाम कई उपलब्धियां लेकर आया। साल 1965 में ही मनोज कुमार की फिल्म 'शहीद' भी रिलीज़ हुई। यह उनके सिने करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में शुमार की जाती है। देशभक्ति के जज्बे से भरी इस फिल्म में मनोज कुमार ने भगत सिंह की भूमिका को रुपहले परदे पर जीवंत किया था। इसी फिल्म से जुड़ा एक दिलचस्प तथ्य यह है कि मनोज कुमार के कहने पर ही गीतकार प्रेम धवन ने न सिर्फ इस फिल्म के गीत लिखेए बल्कि साथ ही फिल्म का संगीत भी दिया। उनके लिखे गीत 'ऐ वतन, ऐ वतन...' और 'मेरा रंग दे बसंती चोला...' आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने तब हुआ करते थे।

जब बने 'भारत कुमार'

साल 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की खत्म होने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने 'जय जवान जय किसान का नारा दिया' और मनोज कुमार से इस पर फिल्म बनाने की पेशकश की। बाद में मनोज कुमार ने फिल्म 'उपकार' का निर्माण किया। 

फिल्म 'उपकार' साल 1967 में रिलीज़ हुई। इस फिल्म में मनोज कुमार किसान के साथ ही जवान की भूमिका भी निभाई थी। इसी फिल्म में उनके चरित्र का नाम 'भारत' था। बाद में वे इसी नाम से फिल्म इंडस्ट्री में बुलाए जाने लगे। इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर अच्छी सफलता मिली। 

इसके बाद साल 1970 में मनोज कुमार के निर्माण और निर्देशन में बनी एक और सुपरहिट फिल्म 'पूरब और पश्चिम' आई। फिल्म में ऐसे लोगों की कहानी दिखाई गई, जो दौलत के लालच में विदेश में पलायन कर कर गए थे। साल 1972 में मनोज कुमार के सिने करियर की एक और महत्वपूर्ण फिल्म 'शोर' आई। 

फिर साल 1974 में आई फिल्म 'रोटी कपड़ा और मकान' मनोज कुमार के करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में शुमार की जाती है। इस फिल्म के जरिये मनोज कुमार ने समाज की अर्थव्यवस्था पर गहरी चोट की साथ ही आम आदमी की जिंदगी में जरूरी रोटी कपड़ा और मकान के मुद्दे को उठाया। वर्ष 1976 में प्रदर्शित फिल्म 'दस नंबरी' की सफलता के बाद मनोज कुमार ने लगभग पांच वर्षों तक फिल्म इंडस्ट्री से किनारा कर लिया। 

दूसरी पारी 

दिलीप कुमार के साथ मनोज कुमार

मनोज कुमार पांच सालों तक सिने दुनिया से कट गए थे। लेकिन फिल्मों के लगाव ने उन्हें यहां दोबारा सक्रिय होने के लिए मजबूर कर ही दिया। साल 1981 में मनोज कुमार ने फिल्म 'क्रांति' के जरिये अपने सिने करियर की दूसरी पारी शुरू की। दिलचस्प बात यह है कि इसी फिल्म से मनोज कुमार के आदर्श दिलीप कुमार ने भी अपने सिने करियर की दूसरी पारी शुरू की थी। देशभक्ति की भावनाओं से भरी इस फिल्म में मनोज कुमार और दिलीप कुमार की जोड़ी को जबरदस्त सराहना मिली। 

लगा झटका

साल 1983 में अपने बेटे कुणाल गोस्वामी को फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित करने के लिए मनोज कुमार ने फिल्म 'पेन्टर बाबू' का निर्माण किया, लेकिन कमजोर पटकथा और निर्देशन के कारण फिल्म टिकट खिड़की पर औंधे मुंह गिरी। फिल्म की असफलता से आहत मनोज कुमार ने लगभग छह सालों तक फिल्म निर्माण से किनारा कर लिया। साल 1989 में मनोज कुमार ने एक बार फिर से फिल्म निर्माण और निर्देशन के क्षेत्र में वापसी की। फिल्म 'क्लर्क' का निर्माण किया, लेकिन बदकिस्मती यह फिल्म भी असफल रही। साल 1999 में आई फिल्म 'जय हिंद' बतौर निर्माता-निर्देशक मनोज कुमार के सिने करियर की अंतिम फिल्म रही, यह फिल्म भी फ्लॉप रही। 

अवॉर्ड रिवॉर्ड 

मनोज कुमार को अपने सिने करियर में सात फिल्मफेयर पुरस्कार से मिले हैं। इसके अलावा फिल्म के क्षेत्र में मनोज कुमार के उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1992 में पदमश्री से भी नवाज़ा गया। साल 2008 में मध्यप्रदेश सरकार ने इन्हें किशोर कुमार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया। वर्ष 2010 में महाराष्ट्र सरकार की ओर से इन्हें राज कपूर राष्ट्रीय सम्मान प्रदान किया गया। 2012 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार के लिए इन्हें नामांकित किया गया था, लेकिन यह पुरस्कार बंगाली अभिनेता और कवि सौमित्र चटर्जी को दिया गया। वैसे साल 2008 में उनका नाम भारत रत्न के लिए भी राज्य सरकार ने भेजा था।

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