सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

फिल्म समीक्षा : सेक्शन 375

इस सप्ताह रिचा चड्ढा और अक्षय खन्ना स्टारर फिल्म ‘सेक्शन 375’ सिनेमाघरों में उतरी है। कुछ वक्त पहले ही आयुष्मान खुराना स्टारर फिल्म ‘आर्टिकल 15’ भी रिलीज़ हुई थी। अब आर्टिकल और सेक्शन को लेकर कई लोगों में काफी उलझने हैं। यहां बताते चलें कि ‘सेक्शन’ यानी कि ‘धारा’, इंडियन पीनल कोड (IPC) में होती है और ‘आर्टिकल’ यानी कि ‘अनुच्छेद’ संविधान में होते हैं। फिल्म के ट्रेलर से स्टोरीलाइन कमोबेश समझ में आ गई होगी। पूरी फिल्म देखने के बाद करते हैं, फिल्म की समीक्षा। 

रिचा चड्ढा और अक्षय खन्ना

फिल्म : सेक्शन 375

निर्माता : अभिषेक पाठक, कुमार मंगत

निर्देशक : अजय बहल 

कलकार : रिचा चड्ढा, अक्षय खन्ना, मीरा चोपड़ा, राहुल भट्ट, संध्या मृदुल

जॉनर : कोर्टरूम ड्रामा

रेटिंग : 3/5

इंडियन पीनल कोड की ‘सेक्शन 375’ के इर्द-गिर्द बुनी गई कहानी इस शुक्रवार सिनेमाघरों में उतर चुकी है। अजय बहल के निर्देशन में बनी और अक्षय खन्ना-रिचा चड्ढा सरीखे कलाकारों से सजी फिल्म कैसी बनी है, आइए करते हैं समीक्षा। 

कहानी 

मुंबई के एक लोअर मीडिल क्लास फैमिली की लड़की अंजली (मीरा चोपड़ा) है, जो फिल्मों में बतौर कॉस्ट्यूम असिस्टेंट के रुप में काम करती है। एक दिन फिल्म डायरेक्टर रोहन खुराना (राहुल भट्ट) को स्टार्स के कॉस्ट्यूम दिखाने उसके घर जाती है। बाद में रोहन खुराना को पुलिस अंजलि के रेप के इल्जाम में गिरफ्तार कर लेती है। 

सबूतों के आधार पर रोहन को सेशंस कोर्ट से दस साल की सज़ा हो जाती है। इस फैसले को हाईकोर्ट में चैलेंज किया जाता है और रोहन का केस मशहूर वकील तरूण सलूजा (अक्षय खन्ना) लड़ते हैं, जबकि अंजलि की तरफ से हीरल गांधी (रिचा चड्ढा) इस केस को लड़ती हैं। 

सुनवाई शुरू होती हैं और फिर धीरे-धीरे केस की परते उधड़ती चली जाती हैं। आखिर उस दिन अंजलि और रोहन के बीच हुआ क्या था? यह सब जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी। 

समीक्षा 

‘बीए पास’ सरीखी फिल्में बनाने वाले अजय बहल ने ‘सेक्शन 375’ के सदुपयोग और दुरुपयोग को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ते हैं। मीडिया ट्रायल, पुलिस इंटरोगेशन और ज्यूडिसरी सिस्टम की खामिया-खूबियों की भी परते खोलते हैं। 

अब चूंकि यह फिल्म एक कोर्टरूम ड्रामा है, तो दमदार डायलॉग्स की उम्मीदें लगाई ही गई हैं। इस फिल्म में आपको कई बेहतरीन संवाद सुनने को मिलेंगे। बोलचाल की भाषा के साथ कानूनी ज़बान का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है। कई बार फिल्म फैलते-फैलते रह गई। 

फिल्म काफी क्रिस्प बनाई गई है। यानी एडिट टेबल पर फिल्म की कांट-छांट में कोई कोताई नहीं बरती गई है। 

फिल्म में एक बात, जो काफी दिलचस्प है। इच्छा और सहमति के भेद को लेकर आपका दिमाग़ झनझना उठेगा। यूं तो एक फिल्म का दूसरी से तुलना सही नहीं है, लेकिन कई बार ‘पिंक’ सा फील दे जाती है। 

यह कहें कि फिल्म पूरी तरह से अक्षय खन्ना की है, तो गलत नहीं होगा। अक्षय ने फिल्म में जिस जुनून के साथ अपनी बात कहते हैं, काबिल-ए-तारीफ है। उनके किरदार को उम्दा तरीके से सजाया-संवारा गया है। 

रिचा चड्ढा अपने किरदार के साथ न्याय करती हैं। रेप जैसे मामले में जिस संवेदनशीलता की ज़रूरत है, वो उनका किरदार भली-भांति निभाता है। यहीं इनके कैरेक्टर की यूएसपी भी रही।

रेप के आरोपी फिल्म डायरेक्टर रोहन यानी राहुल भट्ट और विक्टिम अंजलि यानी मीरा चोपड़ा के लिए फिल्म में करने के लिए कुछ ज्यादा नहीं था। 

कुछ बातें खटकती हैं, जैसे फिल्म में इतनी अंग्रेजी और कानूनी भाषा है कि दिमा भन्ना जाता है। आम आदमी को इसे समझने में थोड़ी दिक्कते आ सकती हैं। 

ख़ास बात

कोर्टरूम ड्रामा आपको पसंद है, तो यह फिल्म ज़रूर आपको पसंद आएगी। 

संबंधित ख़बरें