Mughal-E-Azam: के आसिफ का सपना, जिसे सच होने लगे चौदह साल

हिन्दी सिने जगत की क्लासिक 'मुग़ल-ए-आज़म' को रिलीज हुए 60 साल हो गए हैं, लेकिन आज भी इस फिल्म को देखने के सिनेप्रेमी खुद रोक नहीं पाते हैं। फिल्म तो कमाल है ही, लेकिन इसके बनने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। ऐसे में इस ख़ास मौके पर हम आपको बताने जा रहे हैं कि आखिर के आसिफ ने कैसे किया अपने सपने को साकार?....वो सपना जिसे पूरे करने ने न सिर्फ चौदह वर्ष लगे, बल्कि अपनी पूरी धन-संपत्ति भी लगा बैठे थे। 

K Asif on set of film 'Mughal e azam'
के आसिफ के निर्देशन में बनी 'मुग़ल-ए-आज़म' 5 अगस्त 1960 में रिलीज़ हुई थी। 60 साल पहले इस फिल्म को 150 सिनेमाघरों में रिलीज़ किया गया था। इस फिल्म ने रिलीज़ के पहले ही सप्ताह में 40 लाख रुपए की कमाई की थी। यह के आसिफ के करियर की बेहतरीन फिल्म है। 

हालांकि, के आसिफ की फिल्मोग्राफी आप देखेंगे, तो पाएंगे कि उनके खाते में चार फिल्में दर्ज हैं। इन चार फिल्मों में दो रिलीज़ हुईं और बाकी दो अधूरी रहीं। 

बतौर निर्देशक उनकी पहली फिल्म 'फूल' थी, जो साल 1945 में रिलीज़ हुई थी। कमाल अमरोही की लिखी इस फिल्म में पृथ्वीराज कपूर, वीना कुमारी, याकूब, सुरैया, सितारा देवी, दुर्गा खोटे सरीखे कलाकार थे। फिल्म ने अच्छा-खासा कारोबार किया। इस फिल्म को सबसे पुरानी मल्टीस्टारर फिल्मों में से एक माना जाता है। 

इस फिल्म के बाद के आसिफ ने 'मुग़ल-ए-आज़म' बनाने का सपना देखा, जिसे पूरा करने में तकरीबन चौदह साल लग गए। इस फिल्म को बनाने में कई सारी दिक्कतें आई। कभी फिल्म के बजट को लेकर, तो कभी तकनीकी समस्या, तो कभी फिल्म की कास्ट को लेकर दिक्कतें हुईं, लेकिन इसके बाद भी अपने सपने के पीछ के आसिफ चलते रहे, उसका दामन नहीं छोड़ा। आखिर में सच कर के रहे। 

के आसिफ को 'मुग़ल-ए़-आज़म' का खयाल कैसे आया?...दरअसल, उन्हें शहज़ादे सलीम और अनारकली के इश्क़ की दास्तां बनाने खयाल साल 1944-45 में इम्तियाज़ अली के नाटक 'ताज' को देखकर आया। हालांकि, इस नाटक पर इससे पहले तीन फिल्में और भी बनाई जा चुकी हैं, लेकिन 'मुगडल-ए-आज़म' सा जादू कोई नहीं जगा पाया। 

नाटक 'ताज़' को देखकर आसिफ के दिमाग़ में फिल्म घूम ही रही थी कि उन्होंने आर्देशिर ईरानी की फिल्म ‘अनारकली’देख ली। इसके बाद इस कहानी पर फिल्म बनाने का इरादा पक्का कर लिया। 

अब अपनी इस फिल्म को लेकर अपने दोस्त शिराज़ अली हकिम से मिले। सिने स्टूडियो के मालिक शिराज़ हकीम ने झट से मन बना लिया, क्योंकि दोनों ने मिलकर सफल फिल्म 'फूल' बनाई थी। 

फिल्म की कास्टिंग शुरू हुई और फिल्म में चंद्रबाबू, डी.के सप्रू और नरगिस को साइन किया गया। साल 1946 में फिल्म की शूटिंग बॉम्बे टाकीज स्टूडियो में शुरू हुई। अभी शूटिंग शुरू ही हुई थी कि पार्टीशन की प्रक्रिया शुरू हो गई, जिसके कारण फिल्म के प्रोड्यूसर शिराज़ हकीम ने भारत छोड़ कर पाकिस्तान जाने का फैसला कर लिया। 

अपने स्टूडियो सिने स्टूडियो को बेचने और पाकिस्तान जाने से पहले शिराज़ हकीम ने आसिफ को बिल्डर शापूरजी पल्लोनजी के बारे में बताया, जिनकी मुंबई में सिने स्टूडियो को बनाया था। बाद में शापूरजी पल्लोनजी ने ही फिल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' को प्रोड्यूस किया था। 

पार्टिशन के चलते फिल्म को बंद कर दिया गया, लेकिन साल 1952 में एक बार फिर से के आसिफ ने अपने इस सपने को सच करने की दिशा में कदम बढ़ाया। कास्टिंग शुरू हुई और इस बार उन्होंने पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार, मधुबाला सरीखे कलाकारों को इस फिल्म के लिए चुना। 

'मुग़ल-ए-आज़म' को लेकर कहा जाता है कि इस फिल्म को लेकर 'के आसिफ' जुनून की सारे हदों को पार कर गए थे। कहा तो यह भी जाता है कि 'मुग़ल-ए-आजम' के आसिफ का पहली और आखिरी मोहब्बत थी।

इस फिल्म को बनाने में 14 साल लग गए। के आसिफ इस फिल्म को बनाने के लिए रुपये पानी की तरह बहा रहे थे। शापूरजी पल्लोनजी फिल्म को लेकर हो रहे खर्चे से काफी परेशान थे। शापूरजी ने तो निर्देशक बदलने का मन तक बना लिया था, लेकिन दिलीप कुमार के समझाने के बाद वो माने। 

ख़ैर, के आसिफ इस सपने के लिए इतने पागल थे कि उन्होंने प्रोड्यूसर के पैसे के साथ अपनी सारी धन-संपत्ति भी दांव पर लगा दी थी। कहा जाता है कि एक समय ऐसा आ गया था कि के आसिफ सिगरेट-पान-चाय जैसी ज़रूरतें भी क्रेडिट यानी उधार से पूरी करते थे।

फिल्म बनाने के दौरान लीड एक्टर्स दिलीप कुमार-मधुबाला के बीच प्रेम से लेकर मनमुटाव तक, तकनीकी समस्या से जूझते हुए आखिरकार चौदह साल की अथक मेहनत से उन्होंने अपने सपने के साकार कर लिया।

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