देव आनंद को क्यों बनानी पड़ी थी 'नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया'?

अपनी एक्टिंग और स्टाइल से हिन्दी सिने जगत में खास स्थान रखने वाले अभिनेता देव आनंद ने एक राजनीतिक दल का गठन भी किया था। दरअसल, इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लगाए गए इमरजेंसी के खिलाफ इस दल का गठन किया गया था। वी.शांताराम, रामानंद सागर, जीपी सिप्पी, शत्रुघ्न सिन्हा, धर्मेंद्र, हेमामालिनी, संजीव कुमार के साथ मिल कर उन्होंने 'नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया' बनाई। हालांकि, चुनाव लड़ने से पहले ही यह पार्टी खत्म हो गई...आखिर क्यों हुआ यह जानने के लिए पढ़िए।

Dev Anand formed a Political party

हिन्दी सिने जगत के सदाबहार अभिनेता के रूप में जाने जाने वाले देव आनंद ने एक राजनीतिक दल का भी गठन किया था। सितारों से भरे इस दल का नाम 'नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया' रखा गया था। इस दल में वी शांताराम, जीपी सिप्पी, रामानंद सागर, शत्रुघ्न सिन्हा, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी और संजीव कुमार आदि बड़े नाम थे।

हालांकि, यह पार्टी जिस जोर-शोर से बनी थी, उतनी ही शांत तरीके से टूट भी गई थी। इस पार्टी ने एक भी चुनाव नहीं लड़ा। फिर क्यों बनाई?...सवाल आपके मन में उभरे ही होंगे।

...तो बात इमरजेंसी के समय की है। भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को पूरे देश में इमरजेंसी लगाई थी। प्रधानमंत्री के इस फैसले को देश के लोकतंत्र में काले अध्याय के रूप में आज भी याद किया जाता है, लेकिन इंदिरा गांधी ने जब इमरजेंसी का फैसला लिया था, तो उनके खिलाफ बड़े राजनेता के अलावा कई फिल्मी हस्तियां भी हो गईं थीं।

साल 1975 में देश में इमरजेंसी लगने के बाद देश की राजनीति में भी काफी बदलाव आए। कई नई पार्टियों ने इस दौर को अपने लिए बेहतरीन मौका समझा था। जहां जनसंघ, जनता पार्टी का रूप लेकर कांग्रेस को टक्कर देने की कोशिश में जुटा था, तो वहीं दूसरी ओर कुछ फिल्मी सितारे भी राजनीति में उतरने का फैसला कर चुके थे।

इमरजेंसी खत्म होने के बाद साल 1977 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद जनता पार्टी की सरकार आई। इस पार्टी को फिल्मी सितारों का समर्थन प्राप्त था। वहीं साल 1979 में जनता सरकार के पतन के साथ नए चुनाव का ऐलान हुआ, जिसके लिए फिल्मी सितारों ने भी कमर कस ली।

मुंबई के ताजमहल होटल में 4 सितंबर 1979 को फिल्मी सितारों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में अभिनेता देव आनंद ने 'नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया (एनपीआई)' के गठन की घोषणा की गई। इसी के साथ पार्टी का घोषणापत्र भी जारी किया गया। इस पार्टी का मुख्यालय वी. शांताराम के मुंबई के परेल स्थित राजकमल स्टूडियो में बनाया गया। हालांकि, इसका संचालन देव आनंद के दफ्तर से ही होता था।

इस पार्टी में अपने घोषणा पत्र में लिखा, 'इंदिरा की तानाशाही से त्रस्त लोगों ने जनता पार्टी को चुना, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। अब यह दल भी टूट चुका है। अब जरूरत है एक स्थायी सरकार दे सकने वाली पार्टी की। नेशनल पार्टी के गठन के पीछे विचार है देश के लोगों को थर्ड आल्टर्नेटिव देने का।'

वहीं इस पार्टी की पहली रैली साल 1979 में मुंबई के शिवाजी पार्क में हुई। इस रैली में जमा भीड़ को देखकर सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियां अचरज में पड़ गईं। इस रैली में देव आनंद के अलावा संजीव कुमार, फिल्म निर्माता एफसी मेहरा और जीपी सिप्पी शामिल थे। कहा जाता है कि इस रैली को देखने के बाद न सिर्फ कांग्रेस बल्कि जनता दल भी गहरी चिंता में पड़ गई थी।

अपनी इस राजनीतिक पार्टी के बारे में देव आनंद ने अपनी आत्मकथा 'रोमांसिंग विद लाइफ' में लिखा, 'मैं पार्टी का अध्यक्ष चुना गया था और मैंने वह चुनौती स्वीकार कर ली थी। इस पार्टी का मकसद था लोकसभा चुनाव में उन उम्मीदवारों का समर्थन करना, जो अपने-अपने क्षेत्र में सबसे काबिल हैं।'

भले ही स्टार पॉवर की वजह से रैली सुपर सक्सेसफुल हो गई हो, लेकिन यह पार्टी एक भी चुनाव नहीं लड़ पाई और उससे पहले इसे भंग कर दिया गया। दरअसल, एनपीआई में किसी को भी राजनीति का पूर्व अनुभव नहीं था। देवानंद को अपनी पार्टी के लिए उम्मीदवार ढूंढने में भी परेशानी हो रही थी। साल 1980 में जब लोकसभा चुनाव घोषित हुए, तो पार्टी का कोई परिचित चेहरा चुनाव मैदान में नहीं उतरा। मशहूर वकील नानी पालकीवाला, विजय लक्ष्मी पंडित ने ऐन मौके पर चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। धीरे-धीरे नेशनल पार्टी में सक्रिय फिल्मी जगत के लोग किनारा करने लगे और देवानंद लगभग अकेले ही रह गए। इस तरह एक राजनीतिक पार्टी बगैर चुनाव लड़े ही समाप्त हो गई।

साल 2008 के जयपुर साहित्य महोत्सव में देव आनंद ने अपनी इस राजनीतिक दल को लेकर कहा था कि राजनीति नरम दिल कलाकारों का काम नहीं हैं और उन्होंने अच्छा किया, जो पार्टी भंग कर दी, क्योंकि उन्हें चुनाव लड़ने के लिए काबिल उम्मीदवार ही नहीं मिल रहे थे।

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