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वहीदा ने गुरु दत्त की एक न सुनी

सादगी भरी खूबसूरती की मल्लिका वहीदा रहमान आज अपना 78 वां जन्मदिन मना रही हैं। वहीदा, उन कलाकारों में शुमार हैं, जिनमें स्वभाविक अदाकारी की प्रतिभा है। आज भी वे परदे पर एक अलग कशिश छोड़ जाती हैं। यूं तो वे बेमन से अभिनय जगत में आईं, लेकिन अपनी लगन से प्रतिभा से सबको अपना कायल बना दिया। फिल्मकार और अभिनेता गुरु दत्त को वे अपना गुरू मानती हैं, लेकिन गुरु दत्त और इनका नाम 'अधुरी प्रेम कहानियों' की किताब के किसी सफ्हे पर दर्ज़ होगी। गुरु दत्त ही तो वो शख़्स थे, जो इन्हें बॉलीवुड लेकर आए। गुरु दत्त की हर बात मानने वाली वहीदा, उनकी एक बात पर कभी राज़ी नही हुईं। वहीदा के जन्मदिन पर आइए चलते हैं, उनके बीते कल के गलियारों में।

वहीदा ने 'प्यासा', 'कागज के फूल', 'प्रेम पुजारी', 'गाइड', 'कोहरा', 'बीस साल बाद', 'तीसरी कसम', 'नील कमल' और 'खामोशी' जैसी कई सुपरहिट फिल्मों में काम किया।
मुंबई। वहीदा रहमान, हिन्दी सिने जगत का एक ऐसा नाम जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है। खूबसूरती और स्वभाविक अदाकारी का ऐसा संगम विरले ही लोगों में मिलता है। वैसे वहीदा ने अपने नाम को ही तो चरितार्थ किया है। वहीदा का शाब्दिक अर्थ होता है 'लाजवाब' और वहीदा का कोई जवाब नहीं है।

इनका जन्म फरवरी 3, 1938 विजयवाड़ा को, आंध्र प्रदेश में हुआ था। हिन्दी के अलावा, तमिल, तेलुगू और बंगाली फिल्मों में भी अपने अभिनय का जादू चलाया है।

वहीदा के पिता जिला अधिकारी थे। बचपन से ही वहीदा रहमान का रुझान नृत्य और संगीत की ओर था। पिता ने नृत्य के प्रति वहीदा के रुझान को देखते हुए, उन्हें भरतनाट्यम सीखने की इजाज़द दे दी। तेरह साल की वहीदा भरतनाट्यम की प्रस्तुति मंच पर देने लगी थीं।

उनकी प्रतिभा की सभी ओर तारीफ होने लगी और फिल्म निर्माता उन्हें अपनी फिल्म में लेने के लिए प्रस्ताव भी देने लगे। लेकिन वहीदा के पिता ने हर बार यह कहकर कि बच्ची अभी छोटी है और उसकी उम्र पढ़ने लिखने की है, सभी प्रस्ताव ठुकरा दिए।

कुछ सालों बाद वहीदा के पिता जी का निधन हो गया और परिवार आर्थिक तंगी से गुजरने लगा। घर चलाने की जिम्मेदारी वहीदा पर आ गई। तब अपने पिता के दोस्त की मदद से काम खोजने लगीं। काम खोजने के सिलसिले में उन्हें एक तेलुगू फिल्म में काम करने का मौका मिला। फिल्म सफल रही। फिल्म में वहीदा का अभिनय दर्शकों ने काफी सराहा।

नाम बदलने से किया मना

हैदराबाद में फिल्म के प्रीमियर के दौरान निर्माता गुरु दत्त के एक फिल्म वितरक वहीदा के अभिनय को देखकर काफी प्रभावित हुए। उन्होंने गुरु दत्त को वहीदा से मिलने की सलाह दी। बाद में गुरु दत्त ने वहीदा को स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलाया और अपनी फिल्म 'सीआईडी' में काम करने का मौक़ा दिया। 

फिल्म बनने के दौरान एक दिन गुरु दत्त ने वहीदा को बुलाया और कहा कि अपना नाम बदल दो। वहीदा ने कहा, "क्यों, मेरे नाम में क्या ख़राबी है?" गुरु दत्त के साथ बैठे बाकी लोगों ने कहा कि आपके नाम में वो 'जूसी' एलीमेंट नहीं है। तब वहीदा ने तपाक से कहा कि यह नाम मेरे माता -पिता ने बड़े प्यार से रखा है और मुझे बेहद पसंद है। इसलिए माफ करें, मैं अपना नाम नहीं बदलूंगी।

आपको बता दें कि फिल्म 'सीआईडी' में वहीदा ने खलनायिका की भूमिका निभाई थी। इसके बाद वहीदा ने 'प्यासा', 'कागज के फूल', 'प्रेम पुजारी', 'गाइड', 'कोहरा', 'बीस साल बाद', 'तीसरी कसम', 'नील कमल' और 'खामोशी' जैसी कई सुपरहिट फिल्मों में काम किया।


नहीं कह पाती थीं 'देव'

वहीदा ने अपनी कई बेहतरीन फिल्में देव आनंद के साथ की। इनमें 'सीआईडी', 'प्रेम पुजारी' और 'गाइड' सरीखी फिल्में शामिल हैं। एक इंटरव्यू में वहीदा ने उन्हें याद करते हुए बताया था, "सीआईडी ​​मेरी पहली फिल्म थी और देव साहब तब तक बड़े स्टार बन चुके थे। मैं सेट पर जाकर जब उन्हें गुडमॉर्निग मिस्टर आनंद कहती, तो वो इधर-उधर देखने लगते और कहते तुम किसे गुड मॉर्निंग कह रही हो। मैं कहती आपको, तो कहते मैं कोई मिस्टर आनंद नहीं हूं, मुझे सिर्फ देव कहो। "

वहीदा बताती हैं "जब मैं उनसे कहती कि आप उम्र और एक्सपीरियंस दोनों में मुझसे बड़े हैं इसलिए आपको नाम से नहीं बुला सकती, तो वो कहते अगर मेरी फिल्म की लीडिंग लेडी मुझे साहब या मिस्टर आनंद कहेगी तो मुझे उसके साथ रोमांस करने में दिक्कत होगी। " काफी कोशिश के बाद ही वहीदा उन्हें सिर्फ 'देव' कहकर बुलाने की हिम्मत जुटा पाईं।


वहीदा बनना चाहती थीं 'गुलाबो'

वहीदा रहमान साल 1957 में आई फिल्म 'प्यासा' के किरदार 'गुलाबो' को नहीं करना चाहती थीं। जबकि गुरुदत्त चाहते थे कि यह किरदार वहीदा ही करें। इस बारे में वहीदा बताती हैं "जब गुरु दत्त ने मुझे गुलाबो का रोल ऑफर किया तो मैं चौंक गई। 

खुद गुरु दत्त जानते थे कि मैं ऐसे रोल करने में अनकंफर्टेबल रहूंगी, लेकिन उन्होंने काफी रिक्वेस्ट की और मुझे भरोसा दिलाया कि कहानी की मांग के नाम पर उनसे कोई भी एक्सपोजर या गलत काम नहीं कराया जाएगा "। गुरु दत्त ने आखिर वहीदा को मना ही लिया। गुरु दत्त का वहीदा पर विश्वास रंग लाया। इस फिल्म ने देश ही नहीं विदेशों में भी सफलता के झंडे गाड़ दिए।

बनना था 'छोटी बहू'

'साहिब, बीवी और गुलाम' वहीदा रहमान के करियर की बेहतरीन फिल्मों में गिनी जाती है। इससे जुड़ा किस्सा भी बेहद दिलचस्प है। वहीदा बताती हैं कि जब उन्हें बताया गया कि तुम्हें गुरु दत्त की प्रेमिका का रोल करना है, तो वहीदा को मायूसी हुई। दरअसल, वो फिल्म में 'छोटी बहू', जिसे मीना कुमारी ने निभाया था, वो किरदार करना चाहती थीं।

फिल्म शुरू होने से पहले वहीदा डायरेक्टर के पास गईं और ये बात बताई। डायरेक्टर ने हंसते हुए वहीदा से कहा कि 'छोटी बहू' का किरदार एक ठहरी हुई औरत का किरदार है। एक ऐसी शादीशुदा औरत, जो अपने पति का इंतजार करती है। तुम हाव-भाव और शक्ल से भी औरत नहीं लगती। एक स्कूली बच्चे की तरह पैकअप से ऐसे भागती हैं, जैसे स्कूल की छुट्टी हो गई हो।

वहीदा का कहना है कि वो ये समझ रही थी कि 'छोटी बहू' का किरदार दमदार है और प्रेमिका कम उम्र है, जिसके चलते 'छोटी बहू' की भूमिका को ही ज्यादा वाहवाही मिलेगी। लेकिन गुरु दत्त ने वहीदा को समझाया कि जब फिल्म बनती है, तो हर किरदार का अपना दायरा होता है और कोई भी किरदार हिट हो सकता है।

नहीं चलेगी 'काग़ज़ के फूल'

साल 1959 में गुरु दत्त की फिल्म 'कागज के फूल' में वहीदा ने काम किया। इसके प्रीमियर के दौरान वहीदा रहमान ने कहा था कि फिल्म बहुत हैवी है, नही चलेगी। उनकी इस बात पर कथाकार अबरार अल्वी ने कहा था कि तुम अभी बच्ची हो तुम क्या समझती हो। लेकिन वहीदा की बात ही सच हुई, यह फिल्म चली नहीं। 

ख़ैर, फिल्म न चलने की मुख्य वजह यह थी कि फिल्म अपने वक्त से काफी आगे की थी, लेकिन बाद में इसी फिल्म को लोगों ने काफी सराहा। यह फिल्म देश की महानतम कला फिल्मों में शुमार की गई।

'गाइड' करने से रोका

वहीदा रहमान ने जब फिल्म 'गाइड' को साइन किया, तो कई लोगों ने वहीदा को 'रोजी' का भूमिका करने से मना किया। एक फिल्म प्रोड्यूसर ने तो उनसे यहां तक ​​कहा कि 'आप अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही हो'। लेकिन वहीदा ने इसे करने का मन बना लिया था। इस फिल्म के जरिये ही लोगों को पता चला कि वो एक बेहतरीन डांसर हैं।

वहीदा बताती हैं, 'आज फिर जीने की तमन्ना है' में डांस करते वक्त डायरेक्टर ने उनसे कहा कि दिल खोल कर नाचो, उसी से स्टेप्स बन जाएंगे। इस गाने में वहीदा की डांस परफॉरमेंस को काफी पसंद किया गया।

इस फिल्म के लिए वहीदा को 'फिल्मफेयर' पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई, तो कई लोगों के साथ-साथ खुद वहीदा को भी काफी हैरानी हुई, क्योंकि वहीदा समझ रही थी कि 'रोजी' का किरदार ग्रे शेड लिए हुए था। 

वहीदा सोच रही थी कि एक प्रॉस्टिट्यूट की बेटी जो अपने पति को छोड़कर गाइड के साथ रहती है और फिर उसे भी छोड़ देती है, ऐसे किरदार को ऑडियंस से सिम्पैथी नहीं मिलेगी। खै़र आपको बता दें कि उन्हें फिल्म 'नीलकमल' के लिए भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था।


राजेश खन्ना को याद कराया गाने के बोल

राजेश खन्ना से जुड़ा एक किस्सा याद करते हुए वहीदा बताती हैं, "1969 में रिलीज हुई फिल्म 'खामोशी' एक वुमन ओरिएंटेड फिल्म थी, इसलिए कोई बड़ा स्टार इसमें काम करने को तैयार नहीं था। फिल्म के डायरेक्टर हेमंत कुमार को मैंने ही राजेश खन्ना का नाम सजेस्ट किया था जो इंडस्ट्री में सिर्फ एक फिल्म पुराने थे।

फिल्म 'वो शाम कुछ अजीब थी' गाने के शूट के दौरान राजेश बार-बार लिरिक्स भूल रहे थे। कई बार रीटेक करने के बाद हेमंत दा भी झुंझला रहे थे। तब राजेश ने मुझसे कहा कि जब आप मेरे गले लगें तो गाना गुनगुना दीजिएगा। मैंने ऐसा ही किया और राजेश ने सही बोल पर लिप सिंक करके गाना पूरा किया "। इस फिल्म में वहीदा नर्स की भूमिका में थीं।

अहम पड़ाव

गुरु दत्त और वहीदा का नाम उस समय के फिल्मी पत्रिकाओं में प्रमुखता से छपता था। गुरु दत्त शादीशुदा थे और उनके बच्चे भी थे। इधर वहीदा के पास सिवाए अपनी मां के कोई न था। कहा जाता है कि गुरु, न तो वहीदा को छोड़ना चाहते थे और ना ही गीता दत्त से अलग रहना चाहते थे। 

वहीदा, गुरु के फैसला न कर पाने की परिस्थति से व्यथित हो गईं, और फिर उनसे बात करना ही बंद कर दिया। कहा जाता है कि फिल्म 'साहब, बीवी और गुलाम' के अंतिम दृश्य की शूटिंग के लिए, वे संवाद न बोलने की शर्त पर आई थीं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि मैं गुरू की तरफ देखूंगी ही नहीं।

शक मिजाज पत्नी और दूर जाता प्यार ने ही शायद गुरूदत्त को ऐसा फैसला लेने पर मजबूर कर दिया। अक्टूबर 10, 1964 को गुरु दत्त ने कथित रुप से आत्महत्या कर लिया। गुरु दत्त के जाने के दस सालों बाद अभिनेता और बिजनेसमैन कंवलजीत से साल 1974 में शादी कर ली और धीरे धीरे फिल्मों से किनारा कर लिया।

साल 2000 में पति की आकस्मिक मृत्यु से गहरा धक्का लगा, लेकिन खुद को संभालने के बाद वहीदा ने दोबारा फिल्मों की ओर रुख किया और 'रंग दे बसंती', 'दिल्ली 6', 'ओम जय जगदीश' और 'मैंने गांधी को नहीं मारा 'जैसी कई फिल्मों में काम किया।

फिल्म इंडस्ट्री में उत्कृष्ठ योगदान देने के लिए वहीदा को वर्ष 1972 में पद्मश्री और वर्ष 2011 में पद्मभूषण पुरस्कार से नवाजा गया।

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