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फिल्म समीक्षा : एंग्री इंडियन गॉडेसेस

असल स्त्री संसार का काल्पनिक लोक के दर्शन कराती यह फ़िल्म अर्थपूर्ण सिनेमा की अगली कड़ी की तरह है। 'एंग्री इंडियन गॉडेसेस' के निर्देशक पैन नलिन गुजरात से आते हैं। अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में एक ख़ास स्थान रखने वाले पैन की यह फ़िल्म विदेशों के कई फ़िल्म समारोहों में सराही गई है। भारत समेत कई देशों में स्त्रियां बराबरी का दर्जा पाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। बस इसी संघर्ष को कुछ नाटकीयता के साथ पैन नेे परोसा है। अब दर्शकों का कितना प्यार मिलता है, यह तो बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट बताएगा। फिलहाल हम इसकी समीझा बता रहे हैं ....

एंग्री इंडियन गॉडेसेस का एक दृश्य में संध्या मृदुल, सारा जेन डियाज, अनुष्का मनचंदा, अमृत मघेरा, तनिष्ठा चटर्जी, राजश्री देशपांडे, पवलीन गुजराल
फ़िल्म का नाम:        एंग्री इंडियन गॉडेसेस
निर्माता:                   गौरव ढिंगरा
निर्देशक:                 पैन नलिन
स्टार कास्ट:            संध्या मृदुल, सारा जेन डियाज, अनुष्का मनचंदा, अमृत मघेरा, तनिष्ठा चटर्जी, राजश्री                                         देशपांडे, पवलीन गुजराल
अवधि:                     2 घंटा
रेटिंग:                      3 स्टार (***)

डॉक्यूमेंट्रीज़ और शॉर्ट फ़िल्मों को बनाने में माहिर निर्देशक पैन नलिन ने स्त्री संसार के असल मुद्दों के तारों को भावों के रंगों में डूबों कर बेहतरीन तरीक़े से बुना है। उनका यह प्रयास दर्शकों के दिलों में कितना उतरता है, यह तो वक्त ही बताएगा।

फ़िल्म की कहानी 

फ़िल्म की कहानी 7 अलग-अलग महिलाओं की है, जो अपनी ज़िंदगी को अपने तरीक़े और रफ़्तार से जिए जा रही हैं। सात महिलाओं में पहली हैं एक कंपनी की सीईओ सुरंजना (संध्या मृदुल), दूसरी बॉलीवुड की स्थापित अदाकारा बनने में संघर्षरत जोआना (अमृत मघेरा), तीसरी हैं गायिका मधुरीता (अनुष्का मनचंदा) जो अपना सिंगिंग एल्बम निकालना चाहती हैं।

चौथी हैं सामाजिक कार्यकर्ता नरगिस नसरीन (तनिष्ठा चटर्जी), पांचवीं हैं शादी के बाद अपने पारिवारिक कलह में फंसी पामेला जसवाल (पवलीन गुजराल), छठवीं हैं गोवा में रहने वाली फ्रीडा (सारा जेन डियाज) और सातवीं फ्रीडा की घरेलू नौकर लक्ष्मी (राजश्री देशपांडे ) हैं।

यह सातों अलग-अलग पृष्ठभूमि से आती हैं और सबका अपना एक अलग संघर्ष भ्ाी रहता है। सब जब एक जगह एकत्रित होती हैं, तब सबकी मुश्क़िलों और संघर्ष का पिटारा खुलता है। और यह मौक़ा बनता है फ्रीडा की शादी का।

फ्रीडा शादी करने वाली है, शादी की ख़बर देने के बाद अपनी लास्ट बैचलर वैकेशन पर अपनी सभी सखियों को गोवा बुलाती है। लेकिन अपने होने वाले पति के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया है।

सबके इकट्ठा होने के साथ आप छोटे-छोटे रोजमर्रा के चुलबुले दृश्यों और चुटीले संवादों में बंध जाते हैं। पैन नलिन ने खूबसूरती से इन्हें सीन-दर-सीन पिरोया है। फ़िल्म में खुलापन है, जो सेंसरबोर्ड को कई जगह रास नहीं आया। यह संवादों-दृश्यों में साफ झलकता है।

असंख्य फ़िल्मों में नायिकाओं को आइटम, चीज, माल जैसे शब्दों से संबोधित करने की स्वीकारोक्ति करने वाले सेंसर को यह बात गले नहीं उतरी कि एक युवक को सामने से आता देख कोई नायिका कहे कि देखो लंच आ रहा है! कैंची की धार के ऐसे दसियों नमूने इस फ़िल्म में आपको देखने को मिलेंगे।

अगर आप स्त्री संसार का अलग क़िस्म को सिनेमा देखने की चाहत है, जिसमें हंसी-ठिठोली, चुटीलापन, थोड़ी सी सेक्सी बातें और खूबसूरत चेहरों पर गुस्सा भी हो तो यह फ़िल्म आपके लिए अच्छा विकल्प है। हालांकि, फ़िल्म के अधिकतर संवाद अंग्रेज़ी में है, लेकिन थोड़ी हिंदी भी प्रयोग कर ली गई है।

कुछ दृश्य और संवाद चौंकाते भी हैं खासकर सभी सखियों द्वारा एक लड़के को देखने वाला सीन। इंटरवल के बाद फ़िल्म एक अलग ही मोड़ ले लेती है। जिससे कहानी के सिरे जुड़ते नहीं हैं। कहानी बिखरती है लेकिन यह एक अलग क़िस्म की फ़िल्म है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।

वहीं निर्देशक की तारीफ़ करनी होगी कि फ़िल्म में शामिल सातों अदाकाराओं ने ज्यादातर दृश्यों में मेकअप का प्रयोग नहीं किया है। उनके चेहरे पर मौजूद डार्क सर्कल, पिंपल, तिल से लेकर दाग तक सबकुछ परदे पर साफ नज़र आ रहे हैं। 

बावजूद इसके सभी बेहद खूबसूरत लगीं। उन में कई ऐसे चेहरे हैं जिनसे हम परिचित भी नहीं है लेकिन सभी का सहज अभिनय हमें बांधे रखता है। फिल्म का हर चेहरा खास है।

फ़िल्म के राइटर पैन नलिन ने हर किरदार को अपना अपना दुःख सुनाने का पूरा वक्त दिया है, साथ ही साथ कुछ अहम मुद्दों पर आँखें खोलने का प्रयास भी किया है। 

स्क्रिप्ट में एक बच्ची को माँ- बाप का प्यार ना मिल पाना, एक लड़की को कोर्ट से इन्साफ ना मिल पाना, राह चलते लड़की को छेड़ना, लड़कियों को हेय दृष्टि से देखने जैसी घटनाओं को दर्शाया गया है।

फ़िल्म की कास्टिंग दुरुस्त है और हरेक एक्टर ने उम्दा काम किया है चाहे वो संध्या मृदुल, सारा जेन डियाज, अनुष्का मनचंदा, अमृत मघेरा, तनिष्ठा चटर्जी, पवलीन गुजराल हो या फिर कामवाली बाई के रूप में राजश्री देशपांडे। 

सभी एक्ट्रेसेस का काम सराहनीय है। साथ ही पुलिस अफसर के रूप में आदिल हुसैन ने एक बार फिर से अपनी उम्दा एक्टिंग का हुनर ​​दिखाया है।

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