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फिल्म समीक्षा: बाजीराव मस्तानी

'बाजीराव ने मस्तानी से मोहब्बत की है, अय्याशी नहीं .'... फिल्म' बाजीराव मस्तानी 'का यह संवाद सभी ज़ुबान पर चढ़ गया है। कुछ लोग इस ऐतिहासिक प्रेम कहानी को परदे पर देखने को बेताब होंगे, तो कुछ इस फिल्म को लेकर हुए हंगामे से परेशान भी। अब मन में उलझन होगी कि इसे देखने जाएं या ना ... तो इस उलझन को सुलझाने के लिए फिल्म का रिव्यू पढ़िए ...

फिल्म बाजीराव मस्तानी का ऑफिशियल पोस्टर
फिल्म: बाजीराव मस्तानी (हिस्टोरिकल लव स्टोरी)
निर्माताः सुनील लुल्ला-संजय लीला भंसाली
निर्देशकः संजय लीला भंसाली
संगीतकार: संजय लीला भंसाली
कलाकार: रणवीर सिंह, दीपिका पादुकोण, प्रियंका चोपड़ा, तन्वी आज़मी, मिलिंद सोमण
रेटिंग: 4 (****)

इश्क़ को दुनियावी चश्में से देखने वालों को इस फिल्म में रुहानी इश्क़ का अहसास मिलेगा। साक्ष्य के इर्द-गिर्द गढ़ी कल्पित कहानी लगती है 'बाजीराव मस्तानी'।

सिनेमा का संसार संवादों, गीतों और दृश्यों से ही रचाा जाता है। लेकिन संजय लीला भंसाली इतने भर से ही एक अनूठे संसार को रच डालते हैं। इस बार भी अपनी चिर परिचित शैली से वो एक युग को परदे पर जीवित करने में कामयाब से लग रहे हैं। उनकी फ़िल्म को देखकर के आसिफ़ की 'मुग़ल-ए-आज़म' का सा अहसास हो गया।

कहानी

हिंदुस्तान के मुगलकालीन वर्चस्व वाले इतिहास में मराठों का उदय महत्वपूर्ण अध्याय है। इसी अध्याय में पेशवा श्रीमंत बाजीराव बल्लाल भट (1700 1740 से) हुए। उन्होंने अपने जीवनकाल में 40 से अधिक युद्ध लड़े और एक भी नहीं हारे। लेकिन तलवार की ताकत से सबको झुका लेने वाला यह वीर, बुंदेलखण्ड के राजा छत्रसाल की बेटी मस्तानी के हाथों अपना दिल हार बैठा। मस्तानी, जिसकी रगों में राजपूत पिता और मुस्लिम मां का रक्त दौड़ रहा था।

बाजीराव पेशवा यानी रणवीर सिंह युद्धकला से लेकर शास्त्र कला सब में पारंगत है। उसकी एक खूबसूरत और प्यार करने वाली बीवी काशी बाई यानी प्रियंका चोपड़ा है। एक अभियान के लिए मस्तानी यानी दीपिका पादुकोण बाजीराव से मदद मांगती है, और अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए वह रणवीर के दिल में जगह बना लेती है। लेकिन एक दिन रणवीर से अनजाने में एक भूल हो जाती है, और दीपिका उस भूल को सच मानकर स्वीकार कर लेती है।

खुद को बाजीराव के हाथों हार बैठती है। उधर, इस भूल का सीधा असर पेशवा की पत्नी काशीबाई पर पड़ता है और अपने बाजीराव पर भरोसा करने वाली बीवी की दुनिया ही हिल जाती है। इस तरह एक प्रेम कहानी जन्म लेती है, तो एक पत्नी के अस्तित्व पर संकट आ जाता है। इस सबके बीच धर्म का सवाल पैदा होता है तो राजनैतिक प्रतिष्ठा और सम्मान की बातें भी सामने आती हैं। पर मस्तानी इस बात को नजरअंदाज करवा देती है। फिल्म कई जगह पर कहानी थोड़ी खींचती हुई लगी है।

अभिनय

दीपिका ने मस्तानी की भूमिका में जान डाल दी है। उन्होंने इश्क़ की जो दीवानगी परदे पर ज़िंदा किया है, वह वाकई कमाल है। फ़िल्म में उनका लुक और स्टाइल लोगों के दिलों में उतरता सा लगा। दीपिका शानदार रही हैं, फिल्म में कहीं-कहीं तो वह रणवीर और बाकी सब पर भारी भी पड़ती नजर आईं हैं।

रणवीर सिंह ने भी अच्छा काम किया है। वह एक योद्धा के तौर पर अच्छे लगे हैं। उन्होंने अच्छा एक्शन किया है। दीपिका के साथ भी उनकी कैमिस्ट्री कमाल की जमी है। हालांकि, एकाध बार वो बाजीराव की जगह रणवीर लगे और कहीं-कहीं हिंदी में मराठी एक्सेंट लाकर दर्शकों को गुदगुदाया भी।

बाजीराव और मस्तानी में इश्क़ का खामियाजा बाजीराव की पत्नी काशीबाई को तो भुगतना ही होगा। काशाीबाई बनी प्रियंका ने अपना किरदार बखूबी निभाया। लेकिन पूरी फ़िल्म रणवीर और दीपिका को लेकर ही है। प्रियंका के लिए यह समय इस तरह के किरदार करनेका नहीं है, जिसमें वो आउट ऑफ़ फोकस हों। इसके बाद भी प्रियंका ने दर्शकों को प्रभावित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

बाजीराव की मां, आई साहेब के रूप में तन्वी आज़मी एक उम्दा और याद रखने योग्य भूमिका में है। मिलिंद सोमण पेशवा के सलाहकार की भूमिका में ठीक रहे। फ़िल्म को समेटने के चक्कर में कुछ किरदारों को समेट दिया गया।

प्रकाश कपाड़िया के लिखे डायलॉग काफी दिन तक याद किए जाएंगे। कहानी के मुताबिक, भंसाली का निर्देशन भी अच्छा ही कहा जाएगा।

देखें या नहीं

रिएलिस्टिक सिनेमा देखने वालों को शायद न पसंद आए, लेकिन जिन्हें परदे पर भव्यता देखना पसंद हो, उनके लिए अच्छी फ़िल्म है।

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