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इनकी वजह से टूटी बिग बी और शत्रुघ्न की दोस्ती

एक ज़माने के जिगरी दोस्तों के बीच ऐसी दरार आई कि बरसों एक साथ काम नहीं किया। शत्रुघ्न सिन्हा और अमिताभ बच्चन की दोस्ती टूटने की असल वजह का अब खुलासा हो गया है। इनका खुलासा शत्रुघ्न सिन्हा की बॉयोग्राफी 'एनीथिंग बट खामोश' में किया गया है, जिसका हाल ही में विमोचन हुआ है। फिल्म पत्रकार भारती एस प्रधान की इस किताब में शत्रुघ्न के जीवन से जुड़े कई रहस्यों से पर्दा उठेगा। उनमें से अमिताभ और उनकी दोस्ती, रीना से इश्क और राजनीति की शुरुआत। बड़ी बेबाकी से सबकुछ इसमें दर्ज है।

अमिताभ बच्चन और शुत्रुघ्न सिन्हा
मुंबई। बॉलीवुड में शॉटगन के नाम से मशहूर अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा (शत्रुघ्न सिन्हा) के जीवन के कई रहस्यों पर से अब पर्दा उठने को है। हर मुद्दे पर खुलकर राय देने वाले शत्रु का फेमस डायलॉग 'खामोश' है और यही उनकी बॉयोग्राफी का भी नाम बन गया। 

उनकी बॉयोग्राफी वरिष्ठ फिल्म पत्रकार भारती एस प्रधान ने लिखी है। तक़रीबन सात सालों के रिसर्च का परिणाम 'एनीथिंग बट खामोश' के रूप में सामने आया। इसमे अमिताभ से दोस्ती होने और टूटने की वजह, रीना रॉय से इश्क़ और पूनम से शादी के फसाने और राजनीति के कड़वे-मीठे अनुभव सबकुछ दर्ज है।

दोस्ती टूटने की वजह

अभिनेता से नेता बने शत्रुघ्न सिन्हा और अभिनेता अमिताभ बच्चन (अमिताभ बच्चन) अपने प्रारंभिक दौर में पक्के दोस्त हुआ करते थे, लेकिन बाद में यह तल्खियां इतनी बढ़ी की दोनों ने साथ में काम न करने का निर्णय ले लिया। अमिताभ को फिल्म इंडस्ट्री में लाने का दावा भी शत्रु इस किताब में करते हैं। 

इस किताब के मुताबिक़, तालियों और महिलाओं के कारण इन घनिष्ट दोस्तों की दोस्ती में दरार आई। इनकी दोस्ती की फिल्म में विलेन के रूप में दो हीरोइन्स थीं। इन दोनों का नाम जीनत अमान और रेखा है। किताब में इन दोनों पर आरोप लगाया गया है कि यह दोनों अदाकाराएं इधर की बात उधर और उधर की बात इधर करती थीं।

इसके अलावा अमिताभ शत्रुघ्न से जलन की भावना भी रखते थे। शत्रुघ्न को मिलने वाली वाहवाही अमिताभ से नहीं सही जाती थी। इसी वजह से अमिताभ ने शत्रुघ्न के साथ फिल्में करना बंद कर दिया।

इस किताब में कहा गया है कि दोनों की दोस्ती इतनी पक्की थी कि अमिताभ, शत्रु के लिए सेट पर रो लिया करते थे। वहीं सीनियर होने के नाते शत्रु ने अमिताभ के नाम की कई बार शिफारिश भी की।

यहां तक ​​कि फिल्म 'कालापत्थर' की शूटिंग का भी शत्रु ने जिक्र किया है। वे कहते हैं, "फिल्म 'कालापत्थर' के दौरान ही हम दोनों के रिश्ते तल्ख हो गए थे। इसी फिल्म के सेट पर अमिताभ बच्चन के बगल में मुझे कुर्सी नहीं दी जाती थी। 

हमदोनों ही एक लोकेशन पर और एक ही होटल पर जाया करते थे, लेकिन कभी अमिताभ मेरी कार में नहीं बैठते थे। ना ही कभी उन्होंने कहा कि चलो हम दोनों साथ ही चलते हैं। 

"इसी फिल्म के एक सीन को वे याद करते हुए कहते हैं कि एक फाइट सीन शूट होना था। उस सीन के शूट होने के दौरान अमिताभ लगातार मुझे मारते रहे, जब तक कि शशि कपूर ने हमें आकर अलग नहीं किया।

शत्रुघ्न अपनी बॉयोग्राफी में कहते हैं कि दरअसल, अमिताभ जो शोहरत चाहते थे, वो मुझे मिल रही थी। वे इस बात से खासे परेशान थे। यहां तक ​​कि मैंने अपनी दोस्ती की खातिर कई फिलमें छोड़ी और साइनिंग अमाउंट तक लौटाए।

इन दोनों की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी। कई लोगों को शायद ही पता हो कि एक समय दोनों का सेक्रेटरी भी एक ही हुआ करता था। पवन कुमार दोनों के सेक्रेटरी हुआ करते थे, लेकिन दोस्ती टूटते ही पवन शत्रु के साथ आ गए और अमिताभ ने नया सेक्रेटरी रख लिया।

सबसे बड़ा मलाल

अपने जीवन के सबसे बड़े दुख को भी उन्होंने साझा किया है। वे बताते हैं कि साल 1991 में अपने साथी बॉलीवुड सितारे राजेश खन्ना के खिलाफ दिल्ली से चुनाव लड़ने को लेकर उन्हें बड़ा दुख हुआ था। उन्होंने बताया कि उन्होंने राजेश खन्ना से इस बात से माफी भी मांगी थी।

शत्रु ने कहा, "किसी भी हालत में मैं उपचुनाव के साथ अपना सक्रिय राजनीतिक जीवन शुरू नहीं करता। लेकिन मैं (एलके) आडवाणी जी को मना नहीं कर सकता था, जो कि मेरे गाइड, गुरु और सर्वश्रेष्ठ नेता हैं। "

बीजेपी के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी ने साल 1991 गुजरात के में गांधीनगर और नई दिल्ली की सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा था। दोनों ही सीटों पर जीत मिलने के बाद उन्होंने दिल्ली की सीट छोड़ दी थी। इसके बाद इस सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी ने कांग्रेस उम्मीदवार राजेश खन्ना के खिलाफ शत्रुघ्न सिन्हा को खड़ा किया था।

वे अपनी किताब में कहते हैं कि उस चुनाव में हारना मेरे लिए निराशा के दुर्लभ क्षणों में से एक था। वह लिखते हैं, "वह पहला मौका था, जब मैं रोया था। मुझे इस वजह से भी निराशा हुई कि आडवाणी जी मेरे लिए एक दिन भी चुनाव प्रचार करने नहीं आए। "

हालांकि बाद में पटना साहिब सीट से सांसद को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में केंद्रीय मंत्री का जिम्मा दिया गया। उन्होंने इस किताब में राजनीति के अपने शुरुआती दिनों में खुद को उपेक्षित किए जाने का भी जिक्र किया है। 

वे कहते हैं कि पार्टी के अन्य लोग मुझे आते देख चुप हो जाया करते थे। यहां तक ​​कि एक बार मुझे कहा गया कि आप उस कुर्सी पर जाकर बैठ जाइए, जब आपकी जरूरत होगी बुला लिया जाएगा। इस बात से मैंने खुद को काफी अपमानित महसूस किया। इसके वाकये के बाद मैं तक़रीबन एक साल तक पार्टी कार्यालय नहीं गया।

विपक्षी की भूमिका

अमिताभ और शुत्रघ्न की दोस्ती में भले ही दरार आई हो, मनमुटाव रहे हों, लेकिन किताब के बैक कवर पर सबसे पहले अमिताभ का ही कथन डाला गया है। अमिताभ बच्चन का कथन है, "शत्रुघ्न सिन्हा को बदलने का प्रयास न करें, वे 130 करोड़ के देश में सबसे अलग नज़र आते हैं।" इस कवर पर आडवाणी और सुषमा स्वराज के कोट्स के साथ रजनीकांत और चिरंजीवी के भी कोट हैं।

किताब की भूमिका कांग्रेस नेता शशि थरूर ने लिखी है। स्पष्ट है कि भाजपा के नेता शत्रुघ्न के कुछ कांग्रेसी मित्र भी है और नीतीश और लालू प्रसाद यादव भी हैं।

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