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फिल्म समीक्षा : तेरे बिन लादेन डेड ऑर अलाइव

अभिषेक शर्मा एक बार फिर 'लादेन' को लेकर लोगों को हंसाने आए हैं। वैसे तो फिल्म 'तेरे बिन लादेन डेड ऑर अलाइव' साल 2010 में आई फिल्म 'तेरे बिन लादेन' की सीक्वल है, लेकिन अभिषेक इसे सीक्वल नहीं मानते। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि यह फिल्म सीक्वल नहीं, बल्कि पिछली फिल्म को संदर्भ रूप में प्रयोग किया गया है। उनकी यह बात फिल्म देखकर सच भी लगती है। तो चलिए करते हैं 'तेरे बिन लादेन डेड या अलाइव' की समीक्षा।

फिल्म तेरे बिन लादेन का पोस्टर
फिल्म : तेरे बिन लादेन डेड ऑर अलाइव
निर्माता : पूजा शेट्टी और आरती शेट्टी
निर्देशक : अभिषेक शर्मा
कलाकार : मनीष पॉल,सिंकदर खेर, प्रद्युम्न सिंह, पीयूष मिश्रा और अली जफर
संगीतकार : ध्रुव धाला
रेटिंग : 3 स्टार
जॉनर : कॉमेडी



'द शौकीन्स' और 'तेरे बिन लादेन' के निर्देशक अभिषेक शर्मा  'तेरे बिन लादेन डेड ऑर अलाइव' लेकर आए हैं। इस फिल्म को वे साल 2010 में आई फिल्म 'तेरे बिन लादेन' की पूरी सीक्वल नहीं मानते हैं, बल्कि पिछली फिल्म को संदर्भ के रूप में प्रयोग करने की बात करते हैं। अभिषेक अपनी इस सोच में कामयाब भी होते दिखे। 

कहानी

फिल्म की कहानी ओसामा बिन लादेन के मरने की ख़बर से शुरू होती है। पूरी दुनिया में उसकी मौत को लेकर सस्पेंस बरकरार हैं। यूएस गवर्नमेंट उसे मरा हुआ साबित करना चाहती है, जबकि हथियारों का डीलर ख़लील यानी पीयूष मिश्रा उसे जिंदा साबित करना चाहता है। ताकि उसके बिजनेस पर इसका असर न पड़े।

इन सबके बीच बॉलीवुड निर्देशक शर्मा यानी मनीष पॉल भरी ओसामा बिन लादेन पर आधारित एक फिल्म बनाना चाहता है। लेकिन उसकी फिल्म बनने से पहले ही लादेन के मरने की ख़बर आ जाती है। इसकी वजह से शर्मा की फिल्म अटक जाती है। अब सबकी उम्मीद  भरी नज़रे नकली लादेन पद्दी (प्रद्युम्न सिंह) पर जाकर ठहरती हैं। हर कोई उसका इस्तेमाल करना चाहता है। 

अभिनय 

निर्देशक की भूमिका में मनीष पॉल ने औसत काम किया है। वो अली जफर वाला जादू नहीं चला पाए। हालांकि, मनीष को फिल्म में काफी स्कोप वाले सीन्स भी दिए गए, लेकिन वे अपनी बनी बनाई इमेज से बाहर ही नहीं निकल पाए। वे कई दृश्यों में बहुत अधिक लाउड रहे, जो कि कानों और आंखों दोनों को चुभते हैं। वैसे कुछेक दृश्यों में उनके हाव भाव कमाल के भी रहे।

पिछली फिल्म से चर्चा में आए प्रद्युम्न सिंह ने इस बार भी ओसामा के किरदार को पहले की ही तरह बेहतरीन तरीक़े से निभाया। पीयूष मिश्रा ने भी बढि़या काम किया है। लेकिन फिल्म में सिकंदर खेर ने अपनी अदायगी का जादू चलाया है। उन्हाेंने दोनों अलग-अलग किरदारों में अपनी छाप छोड़ी है। चाहे वो मिस्टर चड्डा हो या मिस्टर डेविड। दोनों भूमिकाओं  में उनके चेहरे के हाव भाव बिल्कुल सटीक नज़र आते हैं। 

निर्देशन 

इस बार अभिषेक का निर्देशन कुछ कमज़ोर सा रहा। जहां पिछली फिल्म की खासियत उसकी कहानी थी, वही इस बार की कहानी ही फिल्म की कमज़ोर कड़ी लग रही है। कई जगह फिल्म जबरन खींची हुई लगती है। अधिकतर डायलॉग्स पंजाबी में होने की वजह से हिंदी के दर्शकों को समझने में कुछ असुविधा भी हो सकती है।

हालांकि, अभिषेक ने ब्लैक  कॉमेडी के दर्ज पर इस फिल्म को गढ़ा है। फिल्म शुरू में तो ठीक रही, लेकिन इंटरवल के बाद किरदार और सीन्स दोनों ही थके और उबाऊ लगे। फिल्म के क्लाइमेक्स को और रोमांचक बनाया जा सकता था। फिल्म की खास बात यह है कि निर्देशक कई दृश्यों में व्यंग्यात्मक तरीके से कई सारी हकीकत बयां कर जाते हैं।

ओसामा को लेकर ओबामा की सोच, अमेरिकी राजनीति की नीतियों की थोड़ी बहुत जानकारी दर्शकों को मिलती है। तालिबानियों से युद्ध के दौरान गधे के मुंह में लाउडस्पीकर लगा कर अलार्म बजाने वाला सीन सबसे मज़ेदार सीन रहा। 

संगीत

फिल्म का संगीत ठीक ठाक सी ही है। कई गाने जबरन ठूंसे हुए लगते हैं। बेजा संगीत की वजह से फिल्म  की कहानी से ध्यान भटक भी जाता है। लेकिन 'मिस्टर प्रेसिडेंट' पर आधारित गाना थोड़ा बहुत मनोरंजक है। 

ख़ास बात

कुल मिलाकर यदि आपने अरसे से कोई काॅमेडी फिल्म नहीं देखी है, तो आप इसे देखने जा सकते हैं। पिछली फिल्म भी बहुत ख़ास नहीं थी, लेकिन मनोरंजन के मामले में अच्छी रही।वीकेंड पर थोड़ा हंसने हंसाने में भी खर्च किया जा सकता है।

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