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फिल्म समीक्षा : ठग्स ऑफ हिन्दोस्तां

एक कहावत है ‘नाम बड़े दर्शन छोटे’ या यूं कहिए ‘ऊंची दुकान फीका पकवान’। आमिर खान, अमिताभ बच्चन सरीखे बड़े नाम के साथ यशराज फिल्म्स सरीखा बैनर कमज़ोर कहानी और बेजान स्क्रीनप्ले की बलि चढ़ गया। बाकी क्या कुछ देखने लायक है और क्या कमज़ोरियां हैं, जानते हैं इस समीक्षा में।

अमिताभ बच्चन और आमिर खान फिल्म ठग्स ऑफ हिन्दोस्तां में
निर्माता : यशराज फिल्म्स 

निर्देशक : विजय कृष्ण अचार्य

कलाकार : अमिताभ बच्चन ,आमिर खान, फातिमा सना शेख, कैटरीना कैफ, मोहम्मद जीशान अयूब, रॉनित रॉय, इला अरुण

संगीत : अजय-अतुल, जॉन स्टीवर्ट

अमिताभ बच्चन और आमिर खान एक साथ पहली बार फिल्म ‘ठग्स ऑफ हिन्दोस्तां’ में नज़र आ रहे हैं। दोनों कलाकारों को एकसाथ पर्दे पर देखने के लिए दर्शक खासे उत्साहित थे। दिवाली का मौका था और इस पर दो बड़े कलाकारों को साथ में स्क्रीन पर देखने का मज़ा उत्सवी रंग को और भी बढ़ाने के लिए काफी था। अब क्या वाकई वो जादू चला पाए हैं, जानने की कोशिश करते हैं। 

कहानी

इस फिल्म की कहानी 1795 के भारत की है। जब भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हुआ करता था और कई राज्य अंग्रेजों के अधीन थे, लेकिन रौनकपुर नाम का एक राज्या ऐसा भी था, जो अंग्रेजों की पकड़ से दूर था। 
उस राज्य का सेनापति खुदाबख्श जहाजी यानी अमिताभ बच्चन अपने मिर्जा साहब यानी रोनित रॉय का और पूरे प्रदेश का खयाल रखता था। 

कुछ कारणों से मिर्जा साहब की मृत्यु हो जाती है और उनकी बेटी जफीरा यानी फातिमा सना शेख की पूरी जिम्मेदारी खुदाबख्श के हाथों में आ जाती है। 

अब इसी बीच कहानी 11 साल आगे बढ़ती है और फिर फिरंगी मल्लाह यानी आमिर खान की एंट्री होती है, जो अपनी दादी की कसम खाकर किसी से कितना भी झूठ बोल सकता है। फिरंगी ऐसे-वैसे, जैसे-तैसे बस पैसे कमाना चाहता है। 

एक घटनाक्रम में खुदा बख्श और फिरंगी मल्लाह की मुलाकात होता है। कहानी में ट्विस्ट तो तब आता है, जब ईस्ट इंडिया कंपनी का जनरल क्लाइव इन सबको परेशान करने लगता है। 

एक नचनियां है, नाम है सुरैया यानी कैटरीना कैफ, अंग्रेजों के दिल बहलाने के काम करती है। फिर फिल्म कई सारे उतार-चढ़ाव से गुजरती है और आखिरकार जो नतीज़ा निकलता है, उसके लिए सिनेमाघर जाना होगा। 

समीक्षा 

बीते कुछ सालों में आमिर खान ने अपनी ऐसी छवि बना ली है कि यदि वो फिल्म में होते हैं, तो लगता है फिल्म में परफेक्शन देखने को पक्का मिलेगा। ऐसे में आमिर के साथ सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और हों, तो फिर उम्मीद दोगुनी हो जात है। 

दर्शकों ने इतने बड़ी स्टारकास्ट को देख कर जो अरमान बांधे होंगे, उस पर निर्देशक विजय कृष्णा आचार्य यानी विक्टर ने ठंडा पानी उढ़ेल दिया है। 

फिल्म की कहानी, स्क्रीनप्ले सबकुछ कमजोर ही है। कुछ-कुछ सीन्स तो ऐसे हैं, जैसे मनोज कुमार की फिल्म ‘क्रांति’ से चुरा लिया है। 

फिल्म का ट्रेलर आते ही वीएफएक्स को लेकर काफी हाय-तौबा मची थी, तब ख़बरें थी कि आमिर खुद वीएफएक्स पर काम करवा रहे हैं, लेकिन आमिर का किया कुछ नज़र नहीं आया, क्योंकि वीएफएक्स आला दर्जे का कमज़ोर है। 

आमिर और अमिताभ के चाहने वालों को शायद यह बात चुभ जाएगी, क्योंकि उन दोनों को देखने से ज्यादा मज़ा मुहम्मद जीशान अयूब को देख कर लगा। बता दें कि जीशान फिल्म में शनीचर प्रसाद के किरदार में थे। 

फिल्म देखकर लगा जैसे उनके किरदार पर कैंची कुछ ज्यादा ही चली है। कटरीना दो गाने और तीन सीन तक की सिमटी रहीं। आमिर और अमिताभ के परफॉर्मेंस अच्छे थे, जैसा कि उनसे उम्मीद थी। वहीं फातिमा सना शेख को जिन्होंने ‘दंगल’ में देखा होगा, उनको फातिमा की यह परफॉर्मेंस निराशाजनक ही लगेगी। 

फिल्म लंबी इतनी है कि बोरियत होने लगती है। हालांकि, फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर बढ़िया है, कुछ गाने अच्छे हैं, लेकिन लंबे समय तक आपकी प्लेलिस्ट में नहीं रहेंगे। 

ख़ास बात

बड़े-बड़े सितारों से सजी इस फिल्म को देखने से बेहतर कुछ और विक्लप तलाशें। नेटफ्लिक्स या अमेज़न पर आने का भी इंतज़ार किया जा सकता है। बाकी मर्ज़ी आपकी। आखिर पैसे आपके हैं। 

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