Movie Review Gone Kesh : रेयर डिसीज के जरिये एक प्यारा संदेश है ‘गॉन केश’

अब बॉलीवुड में नई तरह की कहानियां दिखाने का दौर शुरू हो चुका है। इसी कड़ी में एक फिल्म आई है ‘गॉन केश’। फिल्म के टाइटल की तरह फिल्म कहानी भी जबरदस्त है। रेयर डिसीज एलोपेशिया के इर्द-गिर्द बुनी इस फिल्म के माध्यम से चुपके से एक उम्दा सा संदेश भी ऑडियंस को निर्देशक दे जाता है। 

फिल्म गॉन केश में श्वेता त्रिपाठी

फिल्म : गॉन केश
निर्माता : धीरज घोष 
निर्देशक : कासिम खालो
कलाकार : श्वेता त्रिपाठी, जितेद्र कुमार, विपिन शर्मा, दीपिका अमीन
रेटिंग : 2/5

कहानी 

यह कहानी है एनाक्षी (श्वेता त्रिपाठी) की, जिनकी एलोपेशिया की वजह से बाल चले जाते हैं। अब समाज में ‘बिना बाल की लड़की को खूबसूरत’ नहीं माना जाता, लिहाजा बेचारे मां-बाप अपनी बेटी का इलाज़ करवाने लगते हैं। खान-पान पर संयम, तो कभी दवाइयों की बौछार। इन सबसे एनाक्षी के एलोपेशिया में कुछ खास फर्क तो नहीं पड़ता, लेकिन सिर पर बाल की जगह चेहरे पर दाढ़ी ज़रूर आ जाती है। 

इन सब से परेशान होकर आखिरकार माता-पिता के साथ एनाक्षी को भी समझौता करना है और वो खुद को मना लेती है कि अब उसे पूरी ज़िंदगी विग लगा कर ही रहना होगा। उसकी ज़िंदगी में टर्निंग पॉइंट आता है। फिर उसके साथ बाकियों का भी नजरिया बदल जाता है। 

वो टर्निंग पॉइंट क्या है जानने के लिए सिनेमाघर तक जाना होगा। 

रिव्यू 

'दुनिया में सबकी जिंदगी में कुछ न कुछ कमी है, लेकिन कमियों को मिलाकर ही जिंदगी बनती है। मैं जैसी हूं, वैसी हूं।' जब क्लाइमैक्स में एनाक्षी ये डायलॉग बोलती है, तो लगता है कि ज़िंदगी का सार बोल गई। निर्देशक कासिम खालो की फिल्म 'गॉन केश' भी ही लब्बोलुआब है। 

सबसे पहले बात निर्देशक कासिम खालो की। एलोपेशिया जैसी रेयर बीमारी को केंद्र में रखकर बुनी गई कहानी एक ईमानदार कोशिश है। 

इस प्रेडेक्टेबल फिल्म के किरदार काफी रियल हैं। हालांकि, पास्ट और प्रजेंट के सीन्स की अधिकता की वजह से बेचारी ऑडियंस कन्फ्यूज हो जाती है। फिल्म का नरेटिव बढ़िया है, लेकिन स्क्रीनप्ले और एडिटिंग कमजोर है। वहीं अभि डांगे की सिनेमैटोग्रॉफी तारीफ के लायक है।

अभिनय के मामले में श्वेता की जितनी तारीफ की जाए कम है। स्कूल गोइंग गर्ल से शादी के लायक युवती तक के किरदार में रियल लगी हैं। वहीं माता-पिता के रूप में विपिन शर्मा और दीपिका अमीन भी सहज रहे। टीवीएफ के जितेंद्र कुमार ने भी अपना किरदार अच्छी तरह से निभाया। 

तीन-तीन संगीतकारों ने फिल्म के संगीत को बनाया है, लेकिन मामला औसत ही रहा। 

खास बात

एक रेयर बीमारी, जो नॉट सो पॉपुलर कैटेगरी में आती है, उस पर बनी और उम्दा अभिनय से सजी फिल्म है।

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