फिल्म समीक्षा : थप्पड़



अनुभव सिन्हा के निर्देशन में बनी फिल्म 'थप्पड़' इस शुक्रवार को सिनेमाघरों में उतरेगी। फिल्म में तापसी पन्नू, कुमुद मिश्रा, तन्वी आज़मी, रत्नी पाठक शाह और पावेल गुलाटी अहम भूमिका में हैं। अनुभव सिन्हा की 'थप्पड़' महज एक फिल्म नहीं है, बल्कि समाज से एक तीखा सवाल है। 'थप्पड़' महज गुस्से में आकर हुई क्रिया है या फिर मानसिकता?...ये  सवाल दिल-ओ-दिमाग़ में लंबा शून्य  छोड़ जाता है।

Taapsee Pannu in movie Thappad
फिल्म : थप्पड़

निर्माता : भूषण कुमार, किशन कुमार, अनुभव सिन्हा

निर्देशक : अनुभव सिन्हा 

कलाकार : तापसी पन्नू, पावेल गुलाटी, कुमुद मिश्रा, रत्ना पाठक शाह, तन्वी आज़मी

संगीत : अनुराग सैकिया

जॉनर : सोशल ड्रामा

रेटिंग : 4/5

'मुल्क', 'आर्टिकल 15' बनाने वाले अनुभव सिन्हा अब 'थप्पड़' लेकर आए हैं। तापसी पन्नू की मुख्य भूमिका वाली यह फिल्म 28 फरवरी को सिनेमाघरों में उतरेगी। क्या कुछ दर्शकों को इस फिल्म में देखने को मिलेगा। आइए करते हैं समीक्षा। 

कहानी 

फिल्म की कहानी अमृता (तापसी पन्नू) नाम की एक लड़की की है, जो एक अच्छी पत्नी, बहू, बेटी, बहन और दोस्त है। अमृता ट्रेंड इंडियन क्लासिल डांसर है, लेकिन अपने पति के सपनों को पूरा करने के लिए अपने सपनों को ताक पर रख देती है। वहीं अमृता का पति विक्रम (पवेल गुलाटी) अतिमहत्वकांक्षी है, जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। अचानक एक दिन उसे लगता है कि उसका सपना चकनाचूर होने वाला है और अपना आपा खोने वाला होता है। तभी अमृता, विक्रम को लड़ाई से दूर करने की कोशिश कर रही होती है कि विक्रम उसे सबके सामने 'थप्पड़' मार देता है। 


विक्रम के इस 'थप्पड़' के बाद भावनाओं के अजीब से ज्वार-भाटा से अमृता गुजरती है और अमृता के साथ दर्शक भी बहने लगते हैं। आखिरकार वो इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि जिस पति के इर्द-गिर्द उसने दुनिया बुन रखी है। दरअसल, उस पति की ज़िंदगी में उसकी कोई अहमियत ही नहीं है। लिहाजा वो अपने पति से अलग होने का निर्णय लेती है। 

अपने आत्मसम्मान के लिए वो सबसे विरोध कर अपने पति से तलाक लेती है। तलाक लेने के इस दौर में कितनी मुश्क़िले आती है, किन स्थितियों से अमृता गुज़रती है। यह सब देखने के लिए थिएटर तक जाना होगा।

समीक्षा 

अनुभव सिन्हा और मृणमयी लागू ने छह किरदारों के जरिये समाज की कड़वी सच्चाई को खोल कर रख दिया है। फिल्म का अंत सभी किरदारों के अच्छे-बुर पहलुओं, मन में चल रही उलझनें, द्वंद्व को न सिर्फ खोलते हैं, बल्कि एक विकल्प भी सामने रखते हैं। 

इस 2 घंटे 21 मिनट की फिल्म कई समाजिक मुद्दों पर रोशनी डालती है। शादी के कई अनकहे नियमों पर कुठाराघात करती है, जिसके अनुसार एक शादी को अच्छी तरह चलाने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ महिला की होती है। शादीशुदा महिला के सपनों से ज्यादा परिवार अहम होता है। कुछ करने से पहले 'लोग क्या कहेंगे' का सवाल जब उसके मन में गूंजने लगता है। 

इस फिल्म की स्क्रिप्ट की तरह ही फिल्म का निर्देशन भी उम्दा रहा है। कुछ फिल्मों की अपनी एक गति होती है और उसी गति से उसको चलना चाहिए।

अभिनय के मामले में तापसी पन्नू मैदान मार ले जाती हैं। एक परफेक्ट हाउसमेकर से लेकर अपने आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ने वाली महिला की भूमिका को बड़ी बारीकी से निभा गई हैं। प्रोग्रेसिव फादर की भूमिका में कुमुद मिश्रा काफी सहज लगे हैं। अपनी बेटी की लड़ाई में हौसलाअफजाई करता पिता, दर्शकों को मन मोह लेता है।

वहीं सास बनी तन्वी आजमी और मां बनी रत्ना पाठक शाह ने भी उम्दा काम किया है। 

ख़ास बात

बिलकुल यह एक महिला प्रधान फिल्म है, लेकिन कई छोटे-छोटे अनदेखे कर दी जाने वाली बातों के सिरे खोलती है यह फिल्म। अच्छे सिनेमा के शौकीनों के लिए यह फिल्म 'मस्ट वॉच' है।