इरफान खान : टीवी से हॉलीवुड तक का सफर

इरफान खान बॉलीवुड के उन चंद अभिनेताओं में से हैं, जिन्होंने एक खास मुकाम हासिल किया है। टेलीविज़न से लेकर बॉलीवुड और फिर हॉलीवुड में अपनी अदाकारी के झंडे गाड़े। हालांकि, उनका अभिनय सफर इतना आसान नहीं रहा, लेकिन अपनी काबिलियत को लोहा वो मनवा कर ही माने। फिर आइए उनके करियर के सफर पर डालते हैं एक नज़र। 

irrfan khan acting journey
बेहतरीन अभिनेता इरफान खान का निधन बुधवार 29 अप्रैल 2020 को मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में हो गया। बीते दो साल से गंभीर बीमारी से ग्रसित थे, जिसका लंदन में इलाज करवा कर साल 2019 में लौटे थे। वहीं मंगलवार को उनकी बिगड़ती तबियत को देखते हुए अस्पताल में एडमिट करवाया गया। जहां बुधवार को उन्होंने अंतिम सांसे लीं। 

इरफान आखिरी बार पर्दे पर फिल्म 'अंग्रेज़ी मीडियम' में नजर आए थे, लेकिल लॉकडाउन के चलते फिल्म सिर्फ दो दिन ही सिनेमाघरों में चल पायी। हाल ही में फिल्म को डिजिटल प्लेफॉर्म पर रिलीज़ किया गया। 

वैसे, इरफान उन चंद अभिनेताओं में से हैं, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत टेलीविज़न से किया और फिर बॉलीवुड में धाक जमाने के बाद हॉलीवुड में भी अपना परचम लहराया। 

राजस्थान के जयपुर के रहने वाले इरफान खान ने ड्रामा की पढ़ाई के लिए एनएसडी जॉइन किया और फिर अपने एक्टिंग करियर के लिए मुंबई आ गए। मुंबई आने के बाद उन्होंने 'चाणक्य', 'भारत एक खोज', 'सारा जहां हमारा', 'बनेगी अपनी बात' और 'चंद्रकांता' सरीखे कई शोज़ में काम किया। आज भी 'चंद्रकांता' के अय्यार 'बद्रीनाथ' सबको याद हैं। 

टेलीविज़ में काम करने से पहले ही उनको मीरा नायर की फिल्म 'सलाम बॉम्बे' में कैमियो का ऑफर मिला। इस फिल्म में वो 'लेटर राइटर' की भूमिका में थे, लेकिन उनके किरदार पर काफी कैंची चला दी गई थी, क्योंकि उनकी लंबाई एक बड़ा मुद्दा बन गया था। तब इरफान खान एनएसडी में पढ़ाई ही कर रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि मीरा नायर की यह फिल्म साल 1988 में ऑस्कर अवॉर्ड्स के लिए नॉमिनेट हुई थी। 

इसके बाद साल 1989 में आई बासु चटर्जी की फिल्म 'कमला की मौत' में रूपा गांगुली के अपोजिट इरफान नज़र आए। वहीं साल 1990 में आई तपन सिन्हा की फिल्म 'एक डॉक्टर की मौत' में वो एक बेबाक रिपोर्टर की भूमिका निभाई। हालांकि, इस फिल्म के साथ इरफान भी अनदेखे रह गए। 

एक इंटरव्यू में इरफान ने कहा था कि लोग मेरी एक्टिंग की तारीफ तो करते थे, लेकिन कास्ट नहीं करते थे। कई बार सुभाष घई मेरी तारीफ कर चुके थे, लेकिन मुझे फिल्म में कास्ट नहीं करते थे। अपनी पत्नी सुतापा से में मज़ाक में कहता था, 'देखो कहीं सुभाष घई का मिस कॉल तो नहीं पड़ा।'

ख़ैर, कई सारी फ्लॉप और अनरिलीज़्ड फिल्मों का हिस्सा रहने के बाद उन्हें 'हासिल' मिली। तिग्मांशु धुलिया की साल 2004 में आई 'हासिल' के लिए इरफान खान को फिल्मफेयर बेस्ट विलेन का अवॉर्ड मिला। इस फिल्म के बाद साल 2007 में आई फिल्म 'लाइफ इन अ मेट्रो' से उनके करियर को ब्रेक मिला और उन्होंने बॉलीवुड में अपनी पहचान बना ली।

बॉलीवुड ही नहीं, हॉलीवुड में भी वह जाना पहचाना नाम रहे। वह 'ए माइटी हार्ट', 'स्लमडॉग मिलियनेयर', 'लाइफ ऑफ पाई', 'जुरासिक वर्ल्ड' और 'द अमेजिंग स्पाइडर' मैन जैसी फिल्मों में नजर आए।

एक इंटरव्यू में जब उनसे पसंदीदा किरदार और चुनौतीपूर्ण किरदार को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा, 'मुझे अपने सभी किरदार पसंद हैं। जहां तक चुनौतीपूर्ण किरदारों की बात है, तो 'लाइफ ऑफ पाई' का किरदार काफी चुनौतीपूर्ण रहा, क्योंकि इस फिल्म को दो बार शूट किया गया। एक बार किसी और अभिनेता के साथ और फिर दोबारा किसी और के साथ।'

वहीं किसी फिल्म को करने का अफसोस रहा है। इस सवाल के जवाब में इरफान ने कहा, 'हां, 'सात खून माफ', क्योंकि इस फिल्म में मेरा किरदार एडिट के बाद काफी कुछ बदल गया था। मैं विशाल भारद्वाज के साथ काम करना चाहता था और जब मौका मिला, तो मैंने किरदार पूछा। नरेशन में किरदार 'वुमन बीटर' है जानकर थोड़ा घबराया था। फिर विशाल के साथ इस किरदार को मोडिफाई किया, लेकिन नतीज़ एडिट टेबल पर खराब रहा।'

अभिनेता इरफान खुद को सिर्फ 'अभिनेता' या 'कलाकार' कहलवाना ही पसंद करते थे। सुपरस्टार या स्टार जैसे तमगों से उनको ऐतराज़ रहा है। 

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