Chintu Ka Birthday Review:बमबारी में 'चिंटू' का धमाकेदार बर्थडे सेलीब्रेशन



विनय पाठक, तिलोत्तमा शोम, वेदांत छिब्बर, सीमा पाहवा सरीखे कलाकारों से सजी फिल्म 'चिंटू का बर्थडे' जी 5 पर रिलीज़ हुई है। बम धमाकों के बीच बगदाद में फंसे बिहार के परिवार की उम्मीदों की कहानी है। फिल्म का  निर्देशन सत्यांशु सिंह, देवांशु सिंह ने किया है। 

  zee 5 film 'Chintu ka Birthday' review

फिल्म : चिंटू का बर्थडे
निर्माता : तन्मय भट्ट, रोहन जोशी, आशीष शाक्य, गुरसिमरन खाम्बा
निर्देशक : सत्यांशु सिंह, देवांशु सिंह
कलाकार : विनय पाठक, तिलोत्तमा शोम, वेदांत छिब्बर, सीमा पाहवा
ओटीटी : ज़ी 5
रेटिंग : 3.5/5


ज़ी 5 पर 'चिंटू का बर्थडे' नाम से फिल्म रिलीज़ की गई है। फिल्म में एक छह साल के बच्चे 'चिंटू' के बर्थडे को लेकर बड़ी 'क्रेज़ी सिचुएशन' गढ़ी गई है। बिहार का परिवार बगदाद में फंस गया है, और वह भी तब जब इराक में अमेरिका के सैनिक जमकर बम बरसा रहे थे। विनय पाठक, तिलोत्तमा शोम और सीमा पाहवा सरीखे कलाकारों से सजी फिल्म में क्या कुछ खास है पढ़िए।

कहानी

फिल्म की कहानी साल 2004 में इराक के बैकड्रॉप में बुनी गई है। तब इराक में युद्ध का माहौल था। अमेरिकी सैनिकों को इराक में आए एक साल बीत चुके हैं और इस दौरान सद्दाम हुसैन को पकड़ा जा चुका है और उसके ट्रायल का इंतज़ार है।

वहीं इसी बीच इराक में भारत के बिहार के मदन तिवारी (विनय पाठक) अपने छह साल के बेटे चिंटू (वेदांत छिब्बर), पत्नी सुधा तिवारी (तिलोत्तमा शोम), बेटी लक्ष्मी (बिशा चतुर्वेदी) और सास (सीमा पाहवा) के फंसे हुए हैं। मदन मूल रूप से बिहार से हैं, जो वॉटर प्यूरीफायर के कारोबारी हैं और अपने कारोबार के सिलसिले में बगदाद पहुंचे होते हैं और तभी इराक के हालात खराब हो जाते हैं। हालांकि, भारत सरकार ने इराक में फंसे भारतीय नागरिकों को निकालने का दावा किया, लेकिन मदन नेपाल के पासपोर्ट के जरिये इराक पहुंचे थे, तो उनके हालात और मुश्किल हो गए।

अब इराक में अमेरिका के सैनिकों को आए एक साल हो चुके हैं ऐसे में वहां के लोगों को इन हालातों की आदत सी हो गई है। वहीं मदन तिवारी के बेट 'चिंटू' के लिए ख़ास दिन आता है। दरअसल, चिंटू का 6th बर्थडे है और इस ख़ास दिन को वह अपने दोस्तों के साथ सेलीब्रेट करना चाहता है, क्योंकि वो पिछले साल अपना बर्थडे सेलिब्रेट नहीं कर पाया था। अपने बर्थडे की तैयारियों में वो खुद तो लगा ही है, लेकिन उसका परिवार भी इस दिन को खास बनाने की कोशिश में जुटा हुआ है।

अब चिंटू के बर्थडे के दिन उनका इराकी मकान मालिक चिंटू को विश करने के लिए उनके घर आता है। उसके आने के ठीक बाद ही मोहल्ले में एक धमाका होता है। इसी की जांच और उस इराकी मकान मालिक को पकड़ने के लिए दो अमेरिकी सैनिक चिंटू के घर में घुस आते हैं। चिंटू के पापा को अमेरिकी सैनिक डिटेन करते हैं। परिवार की बर्थडे प्लानिंग धरी रह जाती है, लेकिन कोई इंसान अपने परिवार को दुखी नहीं देख सकता और फिर यहीं मदन तिवारी यानी चिंटू के पापा एक रास्ता अपनाते हैं, उस उपाय से क्या चिंटू का बर्थडे सेलिब्रेट हो पाता है या नहीं?...यह जानने के लिए समय निकालिए और देख डालिए इस फिल्म को।

समीक्षा

इस फिल्म को देखने के बाद 'चिंटू' बने वेदांत छिब्बर के आप दीवाने हो जाएंगे। वहीं घर के मुखिया 'मदन तिवारी' बने विनय पाठक ने अपने किरदार को जीवंत किया है। तिलोत्तमा शोम ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है। 'नानी' बनी सीमा पाहवा भी जबरदस्त रहीं।

सत्यांशु और देवांशु ने फिल्म निर्देशन में कमाल किया है। फिल्म की कहानी एक घर के भीतर ही फिल्माई गई है। इराक का माहौल गढ़ने के लिए सााउंड इफेक्ट का इस्तेमाल किया गया है। हालांकि, फिल्म का मकसद इराक दिखाना नहीं, बल्कि इराक में फंसे परिवार की कहानी दिखाना था, जो वाकई बेहतरीन तरीके से किया गया है। फिल्म की ओपनिंग बिहारी बोली और हनुमान चालीसा के साथ होती है, लेकिन बाद में पता चलता है कि यह बिहारी परिवार बगदाद में फंसा है। फिल्म आगे बढ़ती है और किरदारों के साथ आप जुड़ने लगते हैं।

इस कहानी में कई छोटी-छोटी बातें हैं, जो आपका दिल जीत लेती हैं। छह साल के चिंटू अपना बर्थडे सेलीब्रेट नहीं कर पाया, जिसके लिए वो अमेरिकी राष्ट्रपति को दोषी मानता है। वहीं उसके मां-बाप की भारत न जाने पाने की बेबसी और उसकी परेशान नानी। सभी कुछ इस बेहतरीन तरीके से पिरोया गया है कि इसे एक बार जरूर देखना चाहिए।

भले ही इस फिल्म को सिनेमाई कसौटी पर कसने में थोड़ी कमजोर मिले, लेकिन फिल्म जिस जज्बे को दिखाती है, वो इन मुश्किल हालातों में देखना बनता है। 

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