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फिल्म समीक्षा: फि‍तूर

बतौर अभिनेता अपने करियर की शुरुआत करने वाले अभिषेक कपूर ने 'रॉक ऑन' और 'काय पो छे' सरीखी फिल्मों से खुद को बेहतर निर्देशक साबित किया है। अभिषेक इस बार मशहूर उपन्यासकार चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास 'द ग्रेट एक्सपेक्टेशन्स' पर आधारित फिल्म 'फितूर' लेकर आए हैं। हालांकि, वे इससे पहले चेतन भगत के उपन्यास से प्रेरित होकर 'काय पो छे' का निर्माण कर चुके हैं। वैसे तो चार्ल्स डिकेंस के इस उपन्यास पर कई अंग्रेज़ी फिल्में बनाई जा चुकी हैं, लेकिन पहली बार कोई हिन्दी फिल्म बनाई गई है। अंग्रेज़ी उपन्यास पर आधारित फिल्म को कश्मीर की वादियों में फिल्माया गया है। यह फिल्म दर्शकों को थिएटर तक खींचने में सफल होती है या नहीं, वह तो वक़्त ही बताएगा। फिलहाल आइए करते हैं समीक्षा।

फिल्म फितूर के एक दृश्य में कटरीना कैफ और आदित्य रॉय कपूर
फिल्म : फितूर
निर्माताः सिद्धार्थ रॉय कपूर-अभिषेक कपूर
निर्देशकः अभिषेक कपूर
कलाकार: आदित्य रॉय कपूर, कटरीना कैफ, तब्बू , लारा दत्ता, अजय देवगन, अदिति राव हैदरी, राहुल भट, तुनिशा शर्मा, अक्षय ओबेरॉय, तलत अज़ीज
अवधि: 2 घंटा 11 मिनट
रेटिंग : 2



'गर फ़िरदौस बर-रूए ज़मीन अस्त, हमी अस्तो, हमीं अस्तो, हमीं अस्त' अमीर खुसरो की यह पक्तियां कहती हैं कि धरती पर कहीं स्वर्ग है, तो वो यहीं है, यहीं है। कश्मीर की खूबसूरती को बयां करने के लिए इससे अच्छी उपमा क्या हो सकती है।

इन्हीं वादियों में एक प्रेम कहानी को गढ़ने की कोशिश की है निर्देशक अभिषेक कपूर ने। बर्फ की सफ़ेद चादर पर चिनार के लाल पत्ते। मशहूर उपन्यासकार चार्ल्स डिकेंस की कहानी के कंकाल पर भारतीयनुमा कहानी चढ़ाने कोशिश। कुछ बेहद उम्दा कलाकारों के बीच भावशून्य चेहरों वाले कलाकारों की जमात।

उलझी उलझी कहानी। कई किरदार, जिनमें एक के साथ भी पूरा न्याय नहीं हो पाता है। इन सबके इतर जबरदस्त बैकग्राउंड म्यूज़िक के साथ उम्दा संगीत और बेहतरीन गानों की सौगात। यही कुछ है फिल्म 'फितूर'।

कहानी

यह कहानी है श्रीनगर में रहने वाले गरीब नूर (आदित्य रॉय कपूर) की, जो बचपन में ही अमीर फ़िरदौस (कटरीना कैफ़) से इश्क़ कर बैठता है। फ़िरदौस की मां जहां बेग़म हज़रत (तब्बू) कभी छोटे नूर के इश्क़ की आग को हवा देती हैं और कभी उसे बुझाने की कोशिश करती हैं। 

एक दिन नूर की बहन रूख़सार बम ब्लास्ट में मर जाती है और दूसरे दिन जब नूर फ़िरदौस से मिलने जाता है, तो बता चलता है कि फ़िरदौस को बेग़म हज़रत ने पढ़ने के लिए विदेश भेज दिया है। बड़े होने पर नूर को एक अनजान व्यक्ति की मदद मिलती है और वो दिल्ली जाकर अपने भीतर के कलाकार को संवारता है। 

उसकी मेहनत रंग लाती है और कला की दुनिया में चमकता सितारा बन जाता है। उसी दौरान बचपन का प्रेम यानी फ़िरदौस की उससे दोबारा मुलाक़ात होती है। नूर को लगता है कि फ़िरदौस उसकी ज़िंदगी में वापस आ गई है, लेकिन तभी उसे फ़िरदौस अपनी सगाई की बात बताती है। 

फ़िरदौस पाकिस्तान के एक रसूख़दार नेता से शादी करने वाली होती है और वह भी अपनी मां की मर्जी से। नूर और फ़िरदौस के अलावा एक और प्रेम कहानी है इस फिल्म में। क्या नूर वापस फ़िरदौस की दुनिया में वापस आती है? इस सवाल का जवाब फिल्म देखने पर ही मिलेगा।

निर्देशन -पटकथा

फिल्म कश्मीर में शूट हुई, लिहाज़ा खूबसूरत वादियां तो नज़र आनी ही थी। अभिषेक कपूर ने भरपूर मात्रा में सुंदर लैंडस्कैप दिखाए हैं। सफेद बर्फ पर लाल चिनार के पत्ते, पानी पर तैरते शिकारे या खड़े शिकारों पर जमी बर्फ। 

अब बात करते हैं कहानी के निर्देशन की तो वे पूरी तरह सफल नहीं हो पाए। जिन्हें अभिनय आता है, उन्होंने बेहतरीन काम किया, लेकिन कुछ अभिनेताओं से वो अभिनय नहीं निकवा पाए।

फिल्म में कई सीन बेवजह थे, जो फिल्म को उबाऊ बना रहे थे। कहानी के मूल को स्थापित करने में ही निर्देशक ने तक़रीबन एक घंटा ले लिया। अजय देवगन जैसे अभिनेता का पूरी तरीक़े से इस्तेमाल नहीं किया गया।

अब बात करते हैं पटकथा की। कश्मीर की कहानी है, तो लहजा भी वहीं का होना चाहिए। संवाद बहुत ही बेहतरीन लिखे गए थे। कुछ अदाकारों ने उन्हें बेहतरीन तरीक़े से बोला भी। 

फिल्म में एक ओर बेग़म हैं, जो अपने फैसले पर अडिग हैं, तो वहीं दूसरी ओर प्यार। एक तरफ देश की आज़ादी है, तो दूसरी पर इश्क़ पर लगने वाली सामाजिक पाबंदियां हैं। इतने सारे तथ्यों को फिल्म में सही तरीक़े से बुना नहीं गया है। कश्मीर की खूबसूरती को छोड़ दिया जाए, तो कहानी में देखने जैसा कुछ भी नहीं दिखता। क्लाइमैक्स भी बहुत ही लचर सा है।

अभिनय

अब बात यदि अभिनय की करें, तो बाज़ी जहां बेग़म हज़रत के हाथों में जाती है। तब्बू ने अपने इस किरदार में जान डाल दी। वहीं आदित्य रॉय कपूर सीधे आंखों में देखते हैं और उनका चेहरा सपाट रहता है। वे कई सीन्स में 'जॉम्बी' की तरह दिखते हैं।

यदि अगली बार उन्होंने अपने किरदार को चुनने में सावधानी न बरती, तो उनके लिए आगे मुश्किल हो सकती है। वहीं कटरीना कैफ़ ने फिल्म में अपने लाल बाल और चटख लिपस्टिक का ही जादू चलाया है। उन्होंने डायलॉग भी ब्रिटिश एक्सेंट में ही बोला, जबकि कश्मीर की ज़बान ख़ालिस उर्दू लिए होती है। 

आदित्य रॉय कपूर और कटरीना कैफ़ से अच्छी अदाकारी तो उनके बचपन का किरदार निभाने वाले मोहम्मद अबरार और तुनिशा शर्मा ने किया है। कटरीना और आदित्य की जोड़ी भी बेमेल लगी। कैट कम मेकअप में जब भी दिखीं, वो उम्र दराज़ ही दिखीं। वहीं आदित्य उने सामने बच्चे नज़र आ रहे थे। 

इसके अलावा अदिति राव हैदरी, लारा दत्ता, राहुल भट और तलत अज़ीज ने भी अच्छा काम किया है। अजय देवगन का इतनी छोटी भूमिका के लिए आना समझ नहीं आता, फिर तीन सीन में आने के बाद भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी है।

संगीत

फिल्म में हितेश सोनिक का दिया बैकग्राउंड संगीत अच्छा है। अमित त्रिवेदी के संगीत जबरदस्त है। उसके सभी गाने बेहतरीन हैं। पश्मीना, फितूर, होने तो बतियां, समेत सभी गाने कहानी के साथ बहते हैं।

देखें या ना देखें

कश्मीर की वादियों को देखने का मन हो, तब्बू का अभिनय देखना हो और अमित त्रिवेदी के संगीत को सुनने और देखने का शौक़ है, तो ज़रूर जाएं। आपने बहुत दिनों से कोई पहेली हल ना की हो और लग रहा हो कि दिमाग़ को कसरत की ज़रूरत हो, तो भी ज़रूर जाएं।

लेकिन यदि आप फिल्म में बहती कहानी देखना चाहते हैं, तो न जाना ही बेहतर है। वैसे, वैलेंटाइन वीक के दौरान इस फिल्म को रिलीज़ किया गया है, उम्मीद होनी चाहिए कि कुछ न हो, तो प्रेमी जोड़े इत्मीनान से कुछ वक़्त बिताने के लिहाज से कुर्सियां ​​तो भरेंगे ही।

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