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'उड़ता पंजाब' का 'सेंसर' सच!

अप्रैल में बिना किसी कट के 'उड़ता पंजाब' का ट्रेलर पास कर चुके सेंसर बोर्ड ने अब फिल्‍म को सर्टिफिकेट देने से ही इनकार कर दिया है। बोर्ड ने गालियों की भरमार और ड्रग्स को ग्‍लोरिफाई करने के गाने पर आपत्‍त‍ि जताई है। कहा जा रहा है कि फिल्म के को-प्रोड्यूसर अनुराग कश्यप इस मामले को लेकर इन्फॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग मिनिस्ट्री के पास पहुंचे हैं। आईए जानते हैं 17 जून को रिलीज़ होने जा रही इस फ‍िल्‍म और सेंसर के बीच का पूरा मामला

शाहिद कपूर 'उड़ता पंजाब' के पोस्‍टर में
मुंंबई। शाहिद कपूर की आगामी फिल्‍म  'उड़ता पंजाब' सेंसर में अटक गई है। पंजाब में ड्रग्स की समस्‍या पर बनी इस फिल्‍म में गालियों की भरमार और ड्र्रग्‍स के कई सीन्‍स को लेकर सेंसर बोर्ड ने आपत्‍ति जताई है।

सेंसर ने फिल्‍म में कुछ कट भी सुझाएं हैं। वहीं कुछ सीन्‍स को टोन डाउन भी करने को कहा गया है। अभिषेक  चौबे के निर्देशन में बनी इस फिल्‍म में शाहिद कपूर के अलावा आलिया भट्ट्, दिलजीत दोसांझ और करीना कपूर मुख्‍य भूमिका में हैं। 

कहां है गड़बड़

शुरू में आ रही ख़बरों की मानें तो सेंसर बोर्ड सदस्‍यों में ही फिल्‍म को लेकर मतभेद था, लेकिन इन ख़बरों को सेंसर बोर्ड से जुड़े सूत्रों ने नकार दिया। सूत्रों की मानें तो फिल्म को चार सदस्यों और एक आरओ ने देखा था।

इस फिल्‍म में गालियों की जबरदस्‍त भरमार है और बोर्ड सदस्‍यों ने फिल्‍म में तक़रीबन 80 से लेकर 100 गालियों का आकड़ा दिया है।

इन गालियों को हटाने के लिए कहा गया है और इस फैसले में बोर्ड के सभी सदस्‍य एकमत हैं। लेेकिन जहां कुछ सदस्‍य ज्‍यादा गालियां हटवाने को कह रहे हैं, वहीं कुछ का कहना है कि गालियों को कम संख्‍या में हटाया जाए।

हाालांकि, फिल्‍म को लेकर एकमत न होने की बात ग़लत है। वहीं ड्रग्‍स को ग्‍लोरिफाई करता हुआ एक गाना भी फिल्‍म में है, जिस पर बोर्ड सदस्‍यों को आपत्‍त‍ि है। इसके अलावा एक मर्डर सीन भी है, जिसे टोन डाउन करने की सलाह दी गई है। सेंसर ने शाहिद कपूर के दर्शकों पर पेशाब करने के सीन पर भी आपत्ति जताई है।

निर्माताओं ने कहा 'राजनीति' है वजह


इस फिल्‍म के सह निर्माता और फिल्ममेकर अनुराग कश्यप से जुड़े करीबी सूत्रों की मानें, तो फिल्‍म को राजनीतिक कारणों से रोका गया है, क्‍योंकि अगले साल पंंजाब में चुनाव होने वाले हैं। सेंसर बोर्ड का यह फैसला शिरोमणि अकाली दल की आपत्ति जताने के एक सप्‍ताह बाद लिया गया है। 

ग़ौरतलब है कि अकाली दल ने इस फिल्म को लेकर चिंता जताई थी और पंंजाब को ग़लत तरीक़े से दिखाने का आरोप भी लगाया था। आपको बता दें कि चुनाव के पहले पंंजाब में ड्रग एडिक्शन की समस्‍या  और  तस्करी को लेकर 'आप' और कांग्रेस अकाली सरकार को घेर रहे हैं। ऐसे में यह और बड़ा मुद्दा बन सकता है।

वहीं, अकाली दल एमएलए विरसा सिंह वालोथा का कहना है कि सेंसर बोर्ड का यह फैसला पार्टी के स्टैंड की वजह से नहीं है। फिल्म के रिलीज़ होने पर पार्टी पंंजाब में फिल्‍म की स्‍क्रीनिंग को नहीं रोकेगी। 

अजीब तर्क 

फिल्‍म में गालियों की भरमार के बारे में फिल्‍म से जुड़े एक सूत्र ने तर्क देते हुए कहा कि फिल्म में पंजाब के युवाओं की भाषा का इस्तेमाल किया गया है। इसी वजह से फिल्‍म में इस तरह की भाषा है।

फिल्म की टीम एफसीएटी की शरण में  

फिल्म सेंसर बोर्ड के सदस्यों ने अपने सुझावों के साथ रिपोर्ट सौंपी तो फिल्म की टीम ने अपने मामले को लेकर सीधे फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलेट ट्रिब्यूनल (एफसीएटी) जाने का फैसला किया ।

हालांकि यह भी एक मामला रहा है कि जो भी फिल्में एफसीएटी से पास होकर आती हैं, वह बहुत ही कम सफल हो पाती हैं। इसका रिकॉर्ड हम पिछले कुछ समय में रिलीज़ हुई फिल्मों के मामले में भी देख सकते हैं। मसलन, 'जय गंगाजल', 'लव गेम्स', 'मस्तीजादे' और 'क्या कूल हैं हम'।

ख़ैर, इस सभी हील हवाले के बाद एक सवाल यह भी उठता है कि यद‍ि मुद्दा सामाजिक है और उसे जनता के बीच ले जाना है, तो ऐसे वीभत्‍स सीन्‍स और गालियों की भरमार उसकी पहुंंच को सीमित नहीं कर देती???

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