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फिल्म समीक्षा: जॉली एलएलबी 2

साल 2013 में आई फिल्म ‘जॉली एलएलबी’ की सीक्वल फिल्म ‘जॉली एलएलबी 2’ रिलीज़ हुई है। जहां पहली फिल्म में अरशद वारसी वकील ‘जॉली’ की भूमिका में थे, वहीं इस बार के वकील ‘जॉली’ के किरदार में अक्षय कुमार हैं। फिल्म को सुभाष कपूर ने निर्देशित किया है, लेकिन पिछली बार की तुलना में इस बार फिल्म का बजट लगभग तीन गुना है। अक्षय का अभिनय, सुभाष का निर्देशन और कोर्ट रूम ड्रामा कॉमेडी के तड़के के साथ दर्शकों को लुभाने में कितना कामयाब होता है। ये तो बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट ही बताएगी।

अक्षय  कुमार की जॉली एल एल बी 2 थिएटर में आपको गुदगुदाएगी
फिल्म :       जॉली एलएलबी २ 
निर्माता :     फॉक्स स्टार स्टूडियोज़ 
निर्देशक :   सुभाष कपूर 
कलाकार : अक्षय कुमार, हुमा कुरैशी, अन्नू कपूर, कुमुद मिश्रा, सौरभ शुक्ला, सयानी गुप्ता, 
                   इनामुल हक़, मानव कौल। 
रेटिंग :        3/5
जॉनर :       ब्लैक कॉमेडी, कोर्टरूम ड्रामा

इस बार सुभाष कपूर एक नए ‘जॉली’ के साथ आए हैं। यूं तो यह फिल्म साल 2013 में आई फिल्म ‘जॉली एलएलबी’ की सीक्वल है, लेकिन महज एक किरदार को छोड़ कर पिछली फिल्म से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। पिछली फिल्म के मुक़ाबले इस फिल्म का बजट भी ज़्यादा है, तो क्या फिल्म अक्षय के कंधो पर दूर का सफर कर पाएगी? वैसे तो अरशद की ‘जॉली’ को 2 राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था, अब ये कहां तक जाएगी, ये वक्त ही बताएगा।

कहानी

यह कहानी है वकील जगदीश्वर मिश्रा उर्फ जॉली (अक्षय कुमार) की, जो अपनी पत्नी पुष्पा पांडेय (हुमा कुरैशी) और बच्चे के साथ लखनऊ में रहता है। अपने खुशमिज़ाजी के लिए पूरे कोर्ट में मशहूर ‘जॉली’ एक बड़े वकील के यहां मुंशी है।

दरअसल, कभी जॉली के पिता जिनके यहां मुंशी थे, उन्हीं के यहा जॉली भी काम शुरू करता है। वो इस उम्मीद से उस बड़े वकील का मुंशी बनता है, ताकि आगे चलकर उसे कोई अच्छा केस मिल जाए और फिर उसका अपना एक चैंबर बन जाए। इस बीच अपने घर को चलाने के लिए कुछ छोटे-मोटे काम कर लेता है। 

ऐसे ही एक दिन हिना सिद्दीकी (सयानी गुप्ता) की मुलाक़ात जॉली से हो जाती है, जिसे केस का झांसा देकर जॉली पैसे ले लेता है और अपना चैंबर अलॉट करवा लेता है। इस बात की जानकारी होते ही हिना, जॉली को भला-बुला सुनाती है, जिसके बाद जॉली के पिता भी उससे नाराज़ हो जाते हैं। 

फिर अचानक एक दिन कुछ ऐसा होता है कि जॉली का जमीर जागता है और फिर वो हिना के केस की स्टडी करता है और पीआईएल दाखिल करता है। इसके बाद शुरू होती है एक कहानी, जिसमें इकबाल कासिम (मानव कौल), पुलिस ऑफिसर सिंह (कुमुद मिश्रा), वकील प्रमोद माथुर (अन्नू कपूर) और जज सुंदरलाल त्रिपाठी (सौरभ शुक्ला) की एंट्री होती है और शुरू होता है जबरदस्त कोर्ट रूम ड्रामा, जिसमें बज रही तालियों में आप भी कब तालियां बजाने लगेंगे पता ही नहीं चलेगा। 

निर्देशन 

निर्देशन की बात की जाए, तो रियल लोकेशन पर शूट किए गए दृश्य कमाल के हैं। साथ ही इसके स्क्रिप्ट भी अच्छी थी, लेकिन कुछ कसावट और लाई जा सकती थी। फिल्म का प्लस पॉइंट इसके चुटीले संवाद रहे। अन्नु कपूर, सौरभ शुक्ला और अक्षय कुमार को कई सारे वन लाइनर्स फिल्म में मिले हैं, जिन्होंने दर्शकों को गुदगुदाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वहीं गानों ने फिल्म की रफ्तार को धीमी की है। इस फिल्म में गानों की ज़रूरत नहीं थी। 

अभिनय 

अक्षय कुमार हमेशा की तरह एंटरटेनिंग रहे हैं। हालांकि, उत्तर प्रदेश के टोन को पकड़ते-पकड़ते कब पंजाबीपना आ जाता था, बेचारे खुद भी नहीं समझ पाते होंगे। बाकी जज के रूप में सौरभ शुक्ला पिछली फिल्म से कुछ ज़्यादा ही ‘जॉली’ मूड में दिखे। कुमुद मिश्रा के अभिनय बेजोड़ रही है। वो सिर्फ संवादों से नहीं आंखों से संवाद करते दिखे। वहीं अन्नु कपूर लालची वकील की भूमिका में जबरदस्त रहे। 

संगीत

इस फिल्म का संगीत बेहद लचर रहा। एक भी गाना ऐसा नहीं लगा, जिसने फिल्म को बढ़ाया हो, बल्कि वो बोझिल ही रहे। बस ‘गो पागल’ ही एक ऐसा गाना है, जो लोगों की ज़बान पर चढ़ सकता है। 

ख़ास बात 

यदि आपको कॉमेडी कोर्टरूम ड्रामा पसंद है और अक्षय कुमार के फैन है, तो ज़रूर इस फिल्म को देखने जा सकते हैं। लेकिन अरशद वारसी की ‘जॉली एल एल बी’ को बाहर छोड़ कर ही थिएटर में जाएं।