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फिल्म समीक्षा: बरेली की बर्फी

अश्विनी अय्यर तिवारी ‘निल बटे सन्नाटा’ के बाद ‘बरेली की बर्फी’ लेकर आई हैं। आयुष्मान खुराना, कृति सैनन के साथ राजुकमार राव, पंकज त्रिपाठी और सीमा पाहवा सरीखे कलाकारों से सजी फिल्म बरेली की बर्फी एक रोमांटिक कॉमेडी जॉनर की फिल्म है। हंसते-गुदगुदाते हुए कई तीखे सवाल भी उठाती है। आईए करते हैं फिल्म की समीक्षा...

बरेली की बर्फी के एक दृश्य में कृति सैनन
फिल्म : बरेली की बर्फी
निर्माता : नितेश तिवारी, श्रेया जैन, रजत नोनिया
निर्देशक : अश्विनी अय्यर तिवारी
कलाकार : कृति सैनन, राजकुमार राव, आयुष्मान खुराना, पंकज त्रिपाठी, सीमा पाहवा
संगीत : आर्को पर्वो मुखर्जी, तनिष्क बागची, समीरा कोप्पिकर, समीर उद्दीन और वायु
रेटिंग : 4/5
जॉनर : रोमांटिक कॉमेडी


निकोलस बारौ की ‘इनग्रेडिएंट्स ऑफ़ लव’ पर बेस्ड फिल्म ‘बेरली की बर्फी’ आज सिनेमाघरों में रिलीज़ हो गई है। निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी की यह दूसरी फिल्म है। इस बार भी उनकी फिल्म छोटे शहर पर ही केन्द्रित है। इस कहानी में बिट्टी, चिराग और प्रीतम विद्रोही मुख्य पात्रों में हैं। कॉमेडी की चाशनी में पगी ये प्रेम कहानी आपको भीतर तक मीठी कर जाती है। 

कहानी 

यह कहानी है उत्तर प्रदेश के बरेली शहर के मिश्रा परिवार की। इस परिवार में हैं नरोत्तम मिश्रा (पंकज त्रिपाठी), सुशीला मिश्रा (सीमा पहवा) और इन दोनों की बेटी बिट्टी (कृति सेनन)। नरोत्तम की मिठाई की दूकान है, तो सुशीला शिक्षिका हैं। बिट्टी मिश्रा परिवार की इकलौती संतान है और उसे नरोत्तम मिश्रा ने बेरोक-टोक पाला है। वो सिगरेट पीती है, नॉनवेज खाती है, हॉलीवुड फिल्में देखती है और ब्रेकडांस भी करती है। 

बिट्टी इंडीपेंटेड लड़की है, वो बिजली विभाग के शिक़ायत विभाग में काम करती है। लेकिन बिट्टी की मां परेशान है, क्योंकि लाख कोशिशों के बाद भी बिट्टी की शादी नहीं हो पा रही है। दरअसल, जो भी लड़के उसे देखने आते हैं, वो अजीब-ओ-ग़रीब सवाल करते हैं, जिससे बिट्टी उलटे जवाब दे देती है और सगाई होते-होते रह जाती है। 

बार-बार सगाई टूटने की वजह से माता-पिता को परेशान होते देख बिट्टी घर छोड़ कर जाने का फैसला करती है। मयसामान बिट्टी रेलवे स्टेशन पहुंचती है, तो वहां बुकस्टॉल पर वो ‘बरेली की बर्फी’ नाम की किताब ख़रीद लेती है, ताकि रास्ते में पढ़ सके। उस किताब के लेखक का नाम प्रीतम विद्रोही (राजकुमार राव) रहता है। 

बिट्टी किताब पढ़ती है, तो उसे लगता है कि लेखक ने तो उसके बारे में ही लिखा है। इसके बाद बिट्टी उस लेखक से मिलने का मन बना लेती है और घर वापस आ जाती है। अब ‘बरेली की बर्फी’ की तलाश शुरू होती है और फिर मिलते हैं चिराग दूबे (आयुष्मान खुराना)। चिराग, प्रीतम विद्रोही को खोजने में बिट्टी की मदद करते हैं। इसी दौरान चिराग को बिट्टी से प्रेम हो जाता है। 

अब कहानी में आता है ट्विस्ट, क्योंकि चिराग, प्रीतम को खोज तो लेता है, लेकिन उसे ताकीद देता है कि बिट्टी से इश्क़ करे और उसका दिल तोड़ दे, ताकि चिराग को बिट्टी मिल जाए। क्या प्रीतम विद्रोगी, चिराग का कहा मानता है? क्या चिराग को बिट्टी मिलती है? ऐसे कई सवालों के जवाब जानने के लिए फिल्म तो देखनी पड़ेगा। 

निर्देशन / पटकथा 

फिल्म का निर्देशन बेहतरीन है। पटकथा भी जबरदस्त है। इसके डायलॉग्स काफी नयापन लिए हुए हैं। वन लाइनर्स आपको ठहाके लगाने पर मजबूर कर देंगे। लोकेशंस का जबरदस्त इस्तेमाल किया गया है। कहानी प्रीडेक्टिबल होने के बाद भी दर्शकों को बांधे रखती है। इंटरवल के बाद फिल्म थोड़ी ढीली हो गई थी, जिसे कसावट की ज़रूरत थी। 

अभिनय 

इस फिल्म में जो कलाकार सब पर हावी हो गया, वो था राजकुमार राव। राजकुमार राव में जबरदस्त काम किया है। वहीं सीमा पाहवा और पंकज त्रिपाठी उम्दा रहे। दोनों की कॉमिक टाइमिंग ग़जब की रही। आयुष्मान खुराना ने भी अच्छी काम किया। पहली बार कृति डी-ग्लैम अवतार में दिखी और वो ठीक-ठाक लगी भी। इतने उम्दा कलाकारों के सामने कृति कुछ फीकी तो रहीं, लेकिन निभा ले गईं। 

संगीत

फिल्म के संगीत में कुछ कमी सी तो रही। अभी और काम किया जा सकता है। ‘स्वीटी तेरा ड्रामा’ और ‘ट्विस्ट कमरिया’ दर्शक गुनगुनाते हुए निकले, लेकिन बाकी के गाने ज़बान पर बस नहीं पाए। 

ख़ास बात

परिवार वीकेंड पर यह फिल्म देखी जा सकती है। परिवार का हर वर्ग को ध्यान में रखकर यह साफ-सुथरी फिल्म बनाई गई है।

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