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फिल्म समीक्षा : वीरे दी वेडिंग

शशांक घोष के निर्देशन में बनी फिल्म ‘वीरे दी वेडिंग’ इस शुक्रवार सिनेमाघरों में उतर आई है। महिलाओं की स्टीरियोटाइप छवि को तोड़कर समाज को उनकी एक अलग छवि दिखाने का कारनामा किया है। करीना कपूर, स्वरा भास्कर, सोनम कपूर और शिखा तल्सानिया की अहम भूमिकाओं से सजी इस फिल्म की आइए करें समीक्षा....

वीरे दी वेडिंग  रिव्यू
फिल्म : वीरे दी वेडिंग 
निर्माता : अनिल कपूर, रिया कपूर, एकता कपूर, शोभा कपूर, निखिल आडवाणी
निर्देशक : शशांक घोष 
कलाकार : करीना कपूर, सोनम कपूर, शिखा तल्सानिया, स्वरा भास्कर, सुमित व्यास, नीना गुप्ता
संगीत : शाश्वत सचदेव, विशाल मिश्रा
जॉनर : कॉमेडी ड्रामा
रेटिंग : 3/5

फिल्म ‘वैसा भी होता है 2’, ‘क्विक गन मुरुगन’, ‘मुंबई कटिंग’ और ‘खूबसूरत’ के निर्देशक शशांक घोष इस बार ‘वीरे दी वेडिंग’ लेकर आए हैं और महिलाओं की स्टीरियोटाइप छवि को बदलने की कोशिश की है। अब अपनी इस कोशिश में वो कितने कामयाब हुए हैं, उसे बॉक्स ऑफिस के हवाले छोड़ दीजिए। फिलहाल फिल्म पर चर्चा...

कहानी 

फिल्म की कहानी बचपन की सहेलियों कालिंदी यानी करीना कपूर, अवनि यानी सोनम कपूर, मीरा यानी शिखा तल्सानिया और साक्षी यानी स्वरा भास्कर की है। ये सभी दिल्ली के संपन्न परिवारों से ताल्लुक रखती हैं। चारों ही अपने-अपने रिलेशन में उलझी-उलझी सी हैं। 

एक तरफ कालिंदी है, जिसके लिव-इन पार्टनर ऋषभ यानी सुमित व्यास ने उसे शादी के लिए प्रपोज़ किया है, लेकिन कालिंदी शादी को लेकर मन नहीं बना पा रही है। क्योंकि उसने अपने माता-पिता को अक्सर लड़ते देखे है। साथ ही लगता है कि शादी के बाद अनावश्यक के बंधनों में वो जकड़ी जाएगी। 

दूसरी तरफ अवनि है, उसे शादी करना है, लेकिन उसे अपने मनमुताबिक लाइफ पार्टनर नहीं मिल पा रहा है। वहीं मीरा, जिसने एक विदेशी से घर वालों की मर्जी के खिलाफ शादी कर ली है। जबकि साक्षी तलाक़शुदा है। 

होने को ये चार सहेलियां हैं और चारों की दिक्कतें अलग-अलग है। अब इन इश्यूज़ को ये सभी मिल कर किस तरह से संभालती हैं, वो जानने के लिए फिल्म देखना होगा। 

समीक्षा

शशांक घोष का निर्देशन काफी उलझा-उलझा सा महसूस होता है। फिल्म का स्क्रीनप्ले भी लचर है, लेकिन इसके डायलॉग उसे छुपा ले जाते हैं। फिल्म कई बार नकली-नकली सी महसूस होती है। आम बोल-चाल में महिलाएं भी अपशब्द का प्रयोग करती हैं, लेकिन फिल्म में उसकी अति हो गई है। 

हालांकि, फिल्म आपका मनोरंजन करती है, लेकिन कई बार लगता है कि कुछ नकली-नकली सा का अहसास भी होता है। वहीं फिल्म के किरदारों को थोड़ा और रिवील करना बनता था। कुछ किरदार झलकियों के लिए ही मौजूद रहे। इस फिल्म को देखते हुए लगता है कि ‘दिल चाहता है’ और ‘ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा’ को ब्लेंड करके फीमेल ऑरिएंटेड बना दिया गया है। 

ख़ैर, अभिनय की बात करें, तो शशांक का पूरा फोकस करीना के किरदार यानी कालिंदी पर ही नज़र आया। हालांकि, करीना ने अपने पार्ट को बखूबी निभाया। वहीं स्वरा भास्कर का किरदार भी काफी दमदार था और उन्होंने भी उसे बेहतर तरीक़े से किया। उनके किरदार के पास जबरदस्त डायलॉग थे। 

वहीं शिखा तल्सानिया की भूमिका बस ठीक-ठाक रही। उनके किरदार ज़रूरत के मुताबिक एक्सपोज़र नहीं मिला। ऐसा ही कुछ सोनम कपूर के किरदार के साथ भी हुआ। फिल्म में शिखा और सोनम के किरदार कुछ कमजोर से लगे। 

संगीत की बात की जाए, तो फिल्म के मुताबिक ही शाश्वत सचदेव और विशाल मिश्रा ने संगीत रचा है। ‘तारीफां’ और ‘भांगड़ा ता सजदा’ पहले ही लोकप्रिय हो चुके हैं। इनके अलावा बाकी के गाने भी ठीक-ठाक ही हैं। 

ख़ास बात 

यदि आपको फेमिली एंटरटेनर फिल्म देखना है, तो यह फिल्म आपके लिए बिलकुल भी नहीं है। हां, लेकिन यदि आप कपल हैं, तो फिर आराम से इसका लुत्फ उठाया जा सकता है।

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