Bulbbul Review: हॉरर-सस्पेंस का अद्भुत संसार

अनुष्का शर्मा सुपरनैचुरल सब्जेक्ट्स को काफी पसंद करती हैं। 'परी' और 'फिल्लौरी' के बाद 'बुलबुल' लेकर आई हैं। अन्विता दत्त के इस डायरेक्टोरियल डेब्यू फिल्म में तृप्ति डिमरी, राहुल बोस, अविनाश तिवारी, पाओली डैम, परमब्रता चट्टोपाध्याय सरीखे कलाकारों का साथ मिला है। 'बुलबुल' से निर्देशक बनी अन्विता ने कई गाने लिखे और संवाद लेखन किया है। चलिए फिर जानते हैं कैसी बनी है अन्विता की 'बुलबुल...

 rahul bose in film 'Bulbbul'

फिल्म : बुलबुल
निर्माता: अनुष्का शर्मा, कर्णेश शर्मा
निर्देशक: अन्विता दत्त
कलाकार: तृप्ति डिमरी, राहुल बोस, अविनाश तिवारी, पाओली डैम, परमब्रता चट्टोपाध्याय आदि।
ओटीटी: नेटफ्लिक्स
रेटिंग: 4/5


अनुष्का शर्मा के बैनर तले बनी नेटफ्लिक्स की फिल्म 'बुलबुल' रिलीज़ हो गई है। फिल्म में तृप्ति डिमरी, राहुल बोस, अविनाश तिवारी, पाओली डैम, परमब्रता चट्टोपाध्याय सरीखे कलाकार हैं। इस फिल्म से बतौर निर्देशक शुरुआत करने वाली अन्विता दत्त कई गाने और डायलॉग्स लिखे हैं। इस सुपरनैचुरल फिल्म में क्या कुछ है देखने लायक, चलिए जानते हैं।

कहानी

'बुलबुल' की कहानी 20वीं सदी के बंगाल से शुरू होती है, जहां एक परिवार अपनी छोटी-सी बच्ची की शादी करने में व्यस्त है। बुलबुल (तृप्ति डिमरी) की शादी इंद्रनील ठाकुर (राहुल बोस) से होती है, लेकिन बुलबुल को लगता है कि उसकी शादी हमउम्र सत्या (अविनाश तिवारी) से हुई है। रास्ते भर डोली में बैठी बुलबुल को सत्या कहानी सुनता रहता है।

शादी के बाद ससुराल आने पर उसके कमरे में महेंद्र ठाकुर (राहुल बोस) आते हैं, जो इंद्रनील के छोटे भाई हैं, लेकिन मानसिक विकार से ग्रसित हैं। (राहुल बोस ने दोहरी भूमिका निभाई है। इंद्रनील और महेंद्र)

हालांकि, इंद्रनील कमरे में आने के बाद बुलबुल का सारी सच्चाई बता देते हैं। अब हमउम्र सत्या और बुलबुल एक साथ काफी बातें करते हैं, कहानी कहते और सुनाते हैं। दोनों में दोस्ती अच्छी हो जाती है। अब प्यार रहता है या नहीं, इकरार नहीं किया गया है।

फिर भी 'बड़ी हवेली' में काफी कुछ ऐसा घटता रहता है, जिसका असर सीधा बुलबुल पर पड़ता है। कहने को देवरानी, लेकिन हमेशा उससे जलने वाली 'बिनोदिनी' आए दिन बड़े ठाकुर के कान में जहर घोलती है और एक दिन शक का वो बीज पेड़ बन जाती है। नतीजतन सत्या को लंदन पढ़ाई के लिए जाना पड़ता है और बुलबुल को बड़े ठाकुर के गुस्से का शिकार होना पड़ता है।

कुछ दिनों बाद इंद्रनील ठाकुर हवेली छोड़ कर शहर में रहने चले जाते हैं, उसके कुछ दिनों बाद 'महेंद्र' का रहस्यमयी तरीके से खून हो जाता है और 'बिनोदिनी' को लगता है कि 'चुड़ैल' ने मारा है।

अब उस गांव में 'चुड़ैल' की बातें आम हो गईं। आदमियों को अपना शिकार बना रही है। फिर लौटता है सत्या। सत्या को जब 'चुड़ैल' की कहानी सुनाई जाती है, तो उसे सच नहीं मानता, बल्कि वो किसी आदमी या जानवर का काम बताता है।

इधर हवेली में वो एक बात और नोटिस करता है कि बुलबुल अब एक डॉक्टर से हंस-हंस कर बातें करती है, जो उसे बिलकुल भी नहीं भाता। यहां तक कि उसके लिए मर्यादा की बात कहता है। इसी बीच सत्या 'चुड़ैल' का खात्मा करने का मन बना लेता है।

अब क्या वो 'चुड़ैल' को खत्म कर पाता है, क्या सच में 'चुड़ैल' कोई परलौकिक शक्ति है या फिर कोई इंसानी करतूत...सब कुछ जानने के लिए देख लीजिए 'बुलबुल'।

समीक्षा

फिल्म का निर्देशन अव्वल है। अरसे बाद सिनेमा में बिंब का शानदार इस्तेमाल देखने को मिला। बुलबुल को पीटते इंद्रनील के पीछे सीता को उठाकर ले जाते रावण का जटायु के पर काटने की पेटिंग सिर्फ संयोग से तो वहां नहीं रखी जा सकती। इंद्रनील के भाव-भंगिमाएं भी बिलकुल रावण की तरह ही हैं।

इस कहानी को अन्विता में बचपन में सुनी थी और फिर इसे कागज पर उतार दिया। अरसे बाद कागज पर लिखी इस कहानी को पर्दे पर उतारने का खयाल आया। फिल्म की पटकथा इतनी बेहतरीन है कि परत-दर-परत खुलती है, तो आपका मन इसे एक सेकेंड भी छोड़ने को नहीं करता है।

कहानी में फेमिनिज़्म और सोशल इश्यू को जिस बारीकी और चतुराई को मिलाते हुए फिल्म में ब्लेंड किया गया है, वो कमाल है। दिलचस्प कथानक को बेहतरीन तरीके से पर्दे पर उतारा गया है।

अभिनय का बता करें, राहुल बोस ने उत्कृष्ट अभिनय किया है। इंद्रनील और महेंद्र के किरदारों में राहुल बोस ने काइयांपन, लोलुपता, लालसा, ईर्ष्या, काम, क्रोध और वैराग्य का जो मिश्रण किया है। वह इस फिल्म का असली आनंद है।

इसके बाद तृप्ति डिमरी ने भी बेहतरीन अभिनय किया है। उसका श्रृंगार करना, हंसती-मुस्कुराती बुलबुल लुभावनी लगती है। फिर अत्याचार सहती अबला के चेहरे पर उभरते करूणा के भाव के साथ आप बह जाते हैं। रौद्र रूप में आती है, तो वो 'काली' दिखने लगती है। परमब्रता चट्टोपाध्याय, पाओली डैम, और अविनाश तिवारी ने भी बेहतरीन काम किया है।

सब बातों के अलावा स्पेशल इफेक्ट्स की बात न की जाए, तो मामला जमता नहीं है। स्पेशल इफेक्ट ने फिल्म में चार चांद लगा दिया है। शाहरुख खान की कंपनी वीएफएक्स के मामले में वर्ल्ड लेवल हो चुकी है।

ख़ास बात

डेढ़ घंटे की यह फिल्म आपको बांधे रखेगी। अच्छा देखने का मन हो, तो यह फिल्म 'मस्ट वॉच' कैटेगरी में है। इन दिनों कंटेंट के नाम पर कुछ भी मिल रहा है, लेकिन सिनेमा के नाम पर बेहतरीन पेशकश है।

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