Dil Bechara Review: एक था मैनी, एक थी किज़ी...



सुशांत सिंह राजपूत की आखिरी फिल्म 'दिल बेचारा' ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ कर दी गई। उनकी इस फिल्म का बेसब्री से इंतज़ार था। अंग्रेज़ी नॉवेल और फिल्म 'द फॉल्ट इन ऑवर स्टार्स' पर बनाई गई 'दिल बेचारा' की कहानी कमोबेश सभी को पता है, लेकिन आखिर ऐसा और क्या है, जो आप इस फिल्म को देखने से खुद को रोक नहीं पाएंगे। चलिए जानते हैं...

Sushant Singh Rajput and Sanjana Sanghi's Film 'Dil Bechara' Review

फिल्म : दिल बेचारा
निर्माता : फॉक्स स्टार स्टूडियोज़
निर्देशक : मुकेश छाबड़ा
संगीत : ए आर रहमान
कलाकार : सुशांत सिंह राजपूत, संजना सांघी, स्वास्तिका मुखर्जी, साश्वत चटर्जी, साहिल वैद्य
जॉनर : रोमांटिक ड्रामा
रेटिंग : 4/5

'एक था राजा, एक थी रानी'...यह पंक्तियां आपने कभी न कभी, किसी न किसी से सुनी ज़रूर होंगी। 'दिल बेचारा' इसी फलसफे पर बुनी गई कहानी है, जो कई सारे उतार-चढ़ाव से गुजरते हुए ज़िंदगी के मायने, जीने का तरीका सीखाती है। अब आप इसे मुकेश छाबड़ा और संजना सांघी की डेब्यू फिल्म कहिए या फिर सुशांत की आखिरी फिल्म 'दिल बेचारा'...आखिरकार अपने दर्शकों तक पहुंच ही गई है।

कहानी

फिल्म की कहानी शुरू होती है जमशेदपुर में रहने वाली किज़ी बासु (संजना सांघी) से, जो अपनी मां (स्वास्तिका मुखर्जी) और पिता (साश्वता चटर्जी) के साथ रहती है। किज़ी कैंसर पेशेंट हैं और वो अपनी ज़िंदगी को 'बोरिंग' कहती हैं। इनकी 'बोरिंग' लाइफ में एक दिन हंसता-खिलखिलाता-नाचता मैनी यानी इमैनुअल राजकुमार जूनियर (सुशांत सिंह राजपूत) की एंट्री होती है। मैनी भी ऑस्टियोसार्कोमा कैंसर से पीड़‍ित है और इसके चलते उसका एक पैर काटना पड़ा, लेकिन उसके पास जिंदगी से श‍िकायत करने के लिए वक्‍त नहीं है। वह ज़िंदगी को पूरी रफ्तार से तय कर रहा है।

अपनी मौत का इंतज़ार कर रही मायूस सी किज़ी की ज़िंदगी में मैनी खुशियां-खिलखिलाहट-उम्मीदें लेकर आता है। किज़ी का एक फेवरेट सिंगर है, जिसका नाम अभिमन्यु वीर सिंह (सैफ अली खान) है, लेकिन उसका आखिरी गाना अधूरा है। किज़ी, अभिमन्यु से मिलकर उसके अधूरे गाने का राज़ जानना चाहती है। यही उसका सपना है, जिसे खुद कैंसर से जूझता मैनी पूरी करता है और उसे पैरिस लेकर जाता है। पैरिस जाने से पहले किज़ी की तबीयत बिगड़ जाती है। अब किज़ी को मरने से डर लगने लगा है, क्योंकि उसे मैनी से प्यार हो गया है। किज़ी को लगता है कि वह मैनी पर बोझ बन रही है, लेकिन मैनी, किजी को अकेला नहीं छोड़ना चाहता। फिल्म के आखिर में क्या होता है, जानने के लिए फिल्म ज़रूर देखें।

समीक्षा

बतौर निर्देशक मुकेश छाबड़ा ने बेहतरीन काम किया है। ज़िंदगी-मौत के फलसफे पर गढ़ी कहानी को भारी नहीं होने दिया। फिल्म के फर्स्‍ट हाफ में हंसते-खिलखिलाते निकल जाता है, सेकेंड हाफ में अचानक सिचुएशन बदल जाती है।

यह फिल्म इमोशनल रोलर-कोस्टर राइड है, क्योंकि जितना यह फिल्म हंसाएगी, उतना ही रूलाएगी भी। फिल्म भले ही ऑफिशियल रीमेक हो, लेकिन कॉपी किया हुआ नहीं लगता है। सिनेमैटोग्राफी कमाल की है। जमशेदपुर से लेकर पेरिस तक को बेहतरीन तरीके से कैप्चर किया गया है। स्क्रिप्ट राइटर शशांक खेतान ने उम्दा तरीके से फिल्म का देसीकरण किया है।

मैनी के किरदार में सुशांत जबरदस्त रहे हैं। मैनी के किरदार के हर रंग को फिल्‍म ने बखूबी द‍िखाया है। किज़ी बनी संजना सांघी की बात करें, तो उनकी ये पहली फिल्‍म है, लेकिन अपने किरदार को काफी अच्छी तरह निभा गई हैं। वहीं स्‍वास्तिका मुखर्जी, किज़ी के मां के किरदार में काफी अच्‍छी लगी हैं। किज़ी के पिता बने साश्वत चटर्जी ने भी बिंदास पिता की भूमिका शानदार तरीके से निभाई। अभिमन्यु वीर सिंह बने सैफ अली खान बद्तमीज़ और अक्खड़ व्यक्ति के किरदार में नज़र आए। दो मिनट में ही उन्होंने अपना रंग जमा दिया।

फिल्म 'द‍िल बेचारा' को एक खूबसूरत फिल्‍म बनाने में काफी बड़ा हाथ इस फिल्‍म के म्‍यूजिक का है, जो शानदार है। टाइटल ट्रैक से लेकर 'मैं तुम्‍हारा..', 'मेरा नाम किजी', 'तुम ना हुए मेरे तो क्या' और 'खुल कर जीने का तरीका' जैसे गाने इस खूबसूरत फिल्‍म को और भी सुकून देने वाला बना देते हैं।

ख़ास बात

सुशांत सिंह राजपूत की 'दिल बेचारा' उनके फैन्स के लिए आखिरी तोहफा है। यह 'मस्ट वॉच' फिल्म है। फिल्म का डायलॉग है, 'जन्म कब लेना और मरना कब है, ये हम डिसाइड नहीं कर सकते, लेकिन कैसे जीना है, वो हम कर सकते हैं।' ज़िंदगी को भरपूर तरीके से जीने का फलसफा फिल्म आखिर में छोड़ जाती है। 

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