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‘‘साला’ तो ठीक, लेकिन ‘साली’ है गाली’- ग़ालिब असद भोपाली

इन दिनों सेंसर बोर्ड के काम करने के रवैये पर लगातार सवाल खड़े किए जा रहे हैं। हाल ही में फिल्म ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज़’ को 48 कट का फरमान सेंसर की तरफ से जारी हुआ है। फिल्म को सुनाए इस फरमान के बारे में फिल्म के पटकथा लेखक ग़ालिब असद भोपाली ने चौंकाने वाले खुलासे किए। 

बाबूमोशाय बंदूकबाज़ के पटकथा लेखक ग़ालिब असद भोपाली
मुंबई। कुशान नंदी के निर्देशन में बनी नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी की मुख्य भूमिका वाली फिल्म ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज़’ को सेंसर बोर्ड ने 48 कट का फरमान सुनाया, जिसके बाद अभिनेता नवाज़ ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इससे अच्छा होता कि शॉर्ट मूवी ही बना लेते। हालांकि, मेकर्स ने सेंसर के इस फैसले के ख़िलाफ लड़ने का फैसला किया है। 

सेंसर बोर्ड के इस रवैये के बारे में जब फिल्म ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज़’ के पटकथा लेखक ग़ालिब असद भोपाली से चर्चा हुई, तो उन्होंने सेंसर बोर्ड की तरफ से आई अजीब सी फरमाइशों का पिटारा खोल दिया। 

ग़ालिब कहते हैं कि यह एक ऐसे किरदार की कहानी है, जो सिर्फ अपने पेट पालने के लिए क़त्ल करता है। यह शुद्ध देहाती है और इसने सबसे पहला क़त्ल महज दो केलों के लिए ही कर दिया था। 

ग़ालिब आगे बताते हैं कि इस तरह के किरदार की कहानी कहने के लिए हमें उसी तरह के परिवेश को गढ़ना होगा। अब यदि एक देहाती किलर को सूट-बूट में दिखाया जाए और तमीज़दार ज़बान बोले, तो आप कहानी के साथ इंसाफ नहीं कर रहे हैं। 

जब ग़ालिब से सेंसर के रवैये और कट्स के बारे में सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा, ‘सही मायनो में सेंसर का काम फिल्म में ‘कट्स’ लगाना नहीं, बल्कि सर्टिफिकेट देना है। अब जब हमने पहले ही कह दिया है कि हमें ‘ए’ सर्टिफिकेट दीजिए, तो फिर फिल्म में ‘कट्स’ का सवाल ही नहीं आता।’ 

ग़ालिब कहते हैं कि अब किसी वयस्क को क्या देखना है, इसका निर्धारण भी किया जाएगा, तो स्थिति बहुत भयावह हो जाएगी। 

वहीं जब ग़ालिब से सेंसर की तरफ से आई आपत्तियों के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा, ‘उनकी तरफ से ऐतराज़ जिन चीज़ों पर दर्ज़ करवाया गया है, उसका कोई लॉजिक ही नहीं है।’ 

वो आगे कहते हैं कि जैसे कि उन्होंने कहा कि आप फिल्म में ‘साला’ शब्द इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन ‘साली’ नहीं, क्योंकि ‘साली’ गाली है। इसके अलावा ‘घंटा’ भी अपशब्द है, जबकि घंटा की जगह ‘ठेंगा’ इस्तेमाल करें। 

ग़ालिब ने कहा कि जब हमने कहा कि ‘ठेंगा’ से आपत्ति तो नहीं होगी, तो जवाब मिला, ‘नहीं, ठेंगा मतलब ‘थम्स अप’ होता है।’ वहीं एक अपशब्द था ‘हरामज़ादा’, जिसके बदले ‘हराम के जने’ पर उन लोगों की सहमति मिल गई। 

बोर्ड ने न सिर्फ फिल्म के डायलॉग, बल्कि फिल्म के एक गाने पर भी आपत्ति जताई। वो गाना ‘ये बर्फानी राते पिघल जाने दो’ है। इस पर ग़ालिब ने कहा कि मुझे लगा कि वीडियो से दिक्कत होगी, लेकिन बोर्ड को तो बोल से ही परेशानी थी। दरअसल, बोर्ड के सदस्य ही मापदंड को लेकर स्पष्ट नहीं हैं। 

रियलिस्टिक अप्रोच के सिनेमा के साथ बोर्ड का यह रवैया ग़लत है। इस तरह का रवैया स्क्रिप्ट राइटर्स के क्रिएटिविटी को पंगु बना देगा। कुछ भी लिखने से पहले उनको यह सोचना पड़ेगा कि क्या न लिखा जाए। 

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