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पंचम दा के वो गाने जो रिकॉर्ड हुए, लेकिन रिलीज़ नहीं

एक ऐसा संगीतकार, जिसे जीनियस कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। उसने बेहतरीन संगीत रचा और फिल्म इंडस्ट्री को बेहतरीन संगीत का सौगात दे कर, वो विदा हो गया। गजब को प्रयोगधर्मिता उसके भीतर समाई थी। रोने से लेकर हांफने तक, बारिश की बूंदों से लेकर मोटर का आवाज़ तक में वो संगीत खोज निकालता था। उस शख्स को हम 'पंचम दा' के नाम से जानते हैं। पंचम दा यानी आर डी बर्मन की आज सालगिरह है। आइए इस ख़ास मौक़े पर हम उन नग़मों की चर्चा करते हैं, जिन्हें पंचम ने रिकॉर्ड तो किया, लेकिन वो रिलीज़ नहीं हो पाए। 

पंचम दा के गाने जो रिलीज़ नहीं हो पाए
मुंबई। आज एक ऐसे संगीतकार का जन्मदिन है, जिसकी रगो में खून की जगह संगीत बहता था। वो बारिश की बूंदों, मोटर के हॉर्न, हिचकियों से लेकर हॉफने तक, कदमों की आहट से लेकर पीठ की थपथपाहट तक से संगीत बना लिया करता था। जी बिलकुल हम बात कर रहे हैं, हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री के 'पंचम दा' के बारे में। नाम तो था राहुल देव बर्मन, लेकिन पंचम स्वर में रोने की वजह से नाम पड़ गया 'पंचम'। 

ख़ैर, जिस शख्स के नाम में ही सुर समाया है, वो भला संगीत में किस कदर समाया होगा। पंचम दा ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को बेहतरीन गीतों की सौगात दी है। आज भी उनके गानों के रिमिक्स बना कर लोग झूमने लगते हैं। लेकिन जहां कई गाने श्रोताओं तक पहुंचे, तो वहीं कुछ गाने सिर्फ़ रिकॉर्ड हुए, रिलीज़ नहीं हो पाए। ऐसे ही कुछ गानों की चर्चा करेंगे। 

पहली फिल्म बीच में हुई बंद

आर डी बर्मन को निरंजन नाम के फिल्मकार ने 1959 में बन रही फिल्म 'राज़' के लिए बतौर संगीतकार साइन किया था। इस फिल्म के लिए आरडी ने दो गाने भी रिकॉर्ड किए थे। जहां पहले गाने को आशा भोसले और गीता दत्त ने गाया था, वहीं दूसरे गाने को शमशाद बेगम ने अपनी आवाज़ दी थी। हालांकि, फिल्म बीच में ही बंद हो गई और वो गाने जो रिकॉर्ड किए गए थे, वो बस रिकॉर्ड बन कर ही रह गए। 

गुलज़ार के 'लिबास' का गाना 

गीतकार, निर्देशक गुलज़ार ने साल 1988 में 'लिबास' नाम की फिल्म बनाई थी, लेकिन कुछ कारणों से यह फिल्म उस वक़्त रिलीज़ नहीं हो पाई थी। फिर साल 2014 में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया में इसकी स्क्रीनिंग की गई थी, जिसके बाद इसके सिनेमाघरों में उतरने की उम्मीद जगी, लेकिन उम्मीद बस उम्मीद तक ही रह गई। उस फिल्म में एक गाना है, 'खामोश सा अफसाना...', जो श्रोताओं तक तब तो नहीं पहुंच पाया था, लेकिन अब उसे यूट्यूब पर सुना जा सकता है। 

'मुसाफिर' का तराना 

निर्देशक जब्बर पटेल के निर्देशन में बनी फिल्म 'मुसाफिर' को भी आर डी बर्मन ने संगीत से सजाया था, लेकिन यह फिल्म भी सिनेमाघरों तक नहीं पहुंच पाई। नसीरुद्दीन शाह और रेखा की मुख्य भूमिका वाली इस फिल्म के गाने गुलज़ार ने लिखे थे। तब तो दर्शक और श्रोता इस फिल्म और इसके गाने से महरूम रहे, लेकिन अब इस गाने के वीडियो को यूट्यूब पर देखा और सुना जा सकता है। गाने के बोल हैं, 'सावन सांवरी अंखियां...'। 

'शोले' की कव्वाली

फिल्म 'शोले' के लिए एक कव्वाली भी कंपोज़ की गई थी, लेकिन तब फिल्म के साथ उस कव्वाली को रिलीज़ नहीं किया गया था। कव्वाली के बोल थे, 'चांद सा कोई चेहरा न पहलू हो, तो चांदनी का मज़ा नहीं आता...'। इस गाने को किशोर कुमार और मन्ना डे गाया है। आप भी यूट्यूब पर जाएं और इस बेहतरीन कव्वाली का लुत्फ उठाएं। 

'सितमगर' का यह तराना

साल 1985 में रिलीज़ हुई फिल्म 'सितमगर' का भी एक तराना, जो पंचम दा के चाहने वालों तक नहीं पहुंच पाया। उस गीत के बोल थे, 'किसी ग़रीब दिल से...'। धर्मेंद्र, ऋषि कपूर, पुनम ढिल्लन और परवीन बॉबी की मुख्य भूमिका वाली यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी, लेकिन इसके गाने लोगों के ज़बान पर चढ़ गए थे। फिर भी अफसोसजनक बात यह है कि शैलेंद्र का गाया गाना, 'किसी ग़रीब दिल से...' को फिल्म में नहीं रखा गया। इस तरह से बेहतरीन कंपोजिशन श्रोताओं तक नहीं पहुंचा। 

एक्स्ट्रा शॉट 

संगीतकार, गायक आर डी बर्मन को तो सभी जानते हैं, लेकिन उन्होंने कुछ फिल्मों में बतौर अभिनेता भी काम किया है, यह जानकारी कम ही लोगों को है। बता दें आर डी बतौर अभिनेता पहला ब्रेक महमूद ने साल 1961 में बनी फिल्म 'छोटे नवाब' में दिया था। इसके बाद पंचम दा फिल्म 'भूत बंगला' में भी नज़र आए। 

संगीत के बेताज बादशाह आर डी बर्मन का जन्म 27 जून 1939 को कोलकाता में हुआ। उनके पिता सचिन देव बर्मन हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री के नामचीन संगीतकारों में शुमार थे। 

आर डी को पंचम दा के नाम से बुलाया जाता है, उनके इस नाम के पीछे बड़ा ही दिलचस्प क़िस्सा है। हुआ यह कि एक दिन सचिन देव बर्मन यानी एस डी बर्मन से मिलने अशोक कुमार उनके घर पहुंचे। तब आर डी रो रहे थे, और रोने पर भी 'प' उच्चारित कर रहे थे। अशोक कुमार को उनको रोना अटपटा सा लग रहा था, फिर उन्होंने ग़ौर किया कि आर डी तो 'प' उच्चारित कर रहे हैं और सरगम का पांचवा सुर 'प' ही होता है। इसलिए उन्होंने आर डी को पंचम कह कर पुकारना शुरू किया। उसके बाद तो आर डी बर्मन अपने प्रशंसकों के लिए पंचम दा ही बन गए। 

पंचम दा द्वारा संगीतबद्ध आखिरी फिल्म '1942: ए लव स्टोरी' रही। इसके गाने काफी हिट हुए और आज भी इसे लोग गुनगुनाते हैं। अपनी इस फिल्म के संगीत की कामयाबी वो नहीं देख पाए। 

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